पाषाण शिल्पियों का विशिष्ट गांव, पत्थरकट्टी: संक्षिप्त इतिहास और सामाजिक तानाबाना

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Gaur brahmins village in Patharkatti, Gaya, Bihar, 2018. Photo credit: Tanay Pathak
Gaur brahmins village in Patharkatti, Gaya, Bihar, 2018. Photo credit: Tanay Pathak
बिहार में एक विशिष्ट गांव है पत्थरकट्टी, जहां बेजान पत्थरों में जान फूंकते हैं पाषाण शिल्पी। इसे अहिल्याबाई होल्कर ने बसाया था। उसके इतिहास और सामाजिक ताने-बाने पर एक नजर -

सुनील कुमार I कला लेखक एवं शोधार्थी, लोक कलाओं के अध्ययन में विशेष रुचि

बिहार में कला एवं शिल्प का इतिहास गौरवशाली रहा है। जब भी यहां की कला एवं शिल्प का उल्लेख होता है, मौर्यकालीन वास्तुकला और स्थापत्य कला की चर्चा स्वत: चली आती है। मौर्यकाल भारतीय कलाओं के विकास के दृष्टि से एक युगांतकारी युग था। इस काल के स्थापत्य में काष्ठ का काफी प्रयोग किया जाता था। सम्राट अशोक के समय से भवन निर्माण में पत्थरों का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक ने हजारों स्तूपों का निर्माण कराया था जिनमें स्थापत्य के दृष्टिकोण से सांची, भारहुत, बोधगया, अमरावती और नागार्जुनकोंडा के स्तूप प्रसिद्ध हैं।

अशोक ने 30 से 40 स्तंभों का भी निर्माण कराया था। अशोक के स्तंभों से तत्कालीन भारत के विदेशी से संबंधों का खुलासा होता है। पत्थरों पर पॉलिश करने की कला की तकनीक कितनी उन्नत थी उसका पता इससे चलता है कि आज भी अशोक के लाट की पॉलिश शीशे की भांति चमकती है। मौर्यकालीन स्थापत्य व वास्तुकला पर ग्रीक, फारसी और मिस्र संस्कृतियों का पूरी तरह से प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। परखम में मिली यक्ष की मूर्ति, बेसनगर की मूर्ति, रामपुरवा स्तंभों पर बनी सांड की मूर्ति तथा पटना और दीदारगंज से मिली यक्षी की मूर्तियां विशेष रूप से कला के दृष्टिकोण से अद्वितीय हैं। इतना ही नहीं, यहां के पाषाण शिल्पी पत्थरों को तराशकर प्लेट, कटोरे, खल-मूसल जैसी घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाने का भी चलन था। मूर्तिकला के लिहाज से पाल वंश का उल्लेख महत्वपूर्ण है। बिहार और बंगाल के मूर्तिकारों और शिल्पकारों ने मूर्तिकला में एक नवीन शैली को जन्म दिया था जिसे पाल शैली कहा गया। इसे पूर्वी भारतीय शैली भी कहा जाता है और तारानाथ ने इसका श्रेय धीमान और उसके पुत्र विन्तपाल को दिया। इस शैली की विशिष्टता यह थी कि इसमें मूर्तियों के निर्माण के लिए चिकने काले रंग की कसौटी वाले पत्थरों एवं धातुओं का प्रयोग किया गया था।  

कसौटी और सघन घनत्व वाले काले पत्थर बिहार में गया क्षेत्र के पत्थरकट्टी पहाड़ वाले इलाके में मिलते हैं। पत्थरकट्टी उसी पहाड़ की तलहटी में बसा एक गांव है जो अतरी विधानसभा क्षेत्र के खुखरी पंचायत में अवस्थित मौजा कटारी में आता है। मौजा कटारी तीन छोटे-छोटे गांवों का सामुच्य है। पहला गांव है कटारी, दूसरा वर्तमान पत्थरकट्टी और तीसरा झरहा जिसे कटारी-पत्थरकट्टी के नाम से जाना जाता है। पत्थरकट्टी दो शब्दों का युग्म है, पत्थर और कट्टी यानी काटना। यह स्थानीय समुदाय विशेष का कार्य विशेष से संबंध स्थापित करने का प्रकटीकरण भी है। कटारी-पत्थरकट्टी में कटारी शब्द कट्टर शब्द का अपभ्रंश प्रतीत प्रतीत होता है। कहा जाता है कि 1987 के विद्रोह के दौरान पत्थरकट्टी के स्थानीय लोगों ने नियामतपुर गांव के मुसलमानों के साथ मिलकर अपने पराक्रम से अंग्रेजों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। उस विद्रोह में खेत रहे वीरों को स्थानीय समाज ने कट्टर कहकर सम्मानित किया था और तब से उस गांव का नाम कटारी-पत्थरकट्टी हो गया। बहारहाल, पत्थरकट्टी की चौहद्दी इस प्रकार है, पूर्व में खुखरी, पश्चिम में कोशिला, उत्तर में बिहटा और दक्षिण में नियामतपुत गांव। खुखरी पत्थरकट्टी के बाद पाषाण शिल्प का दूसरा महत्वपूर्ण केंद्र है।

गया की तरफ से मानपुर-सर्बह्दा सड़क पर करीब तैंतीस किलोमीटर बढ़ने पर पत्थरकट्टी गांव आता है। इसी सड़क पर ठीक अगला गांव खुखरी है। यह सड़क इस्लामपुर को राजगीर से जोड़ने वाली सड़क राजगीर-इस्लामपुर-पर्वतीपुर में जाकर मिलती है। इसलिए पत्थरकट्टी पटना के रास्ते जहानाबाद और वहां से वाया इस्लामपुर और सर्बहद्दा भी पहुंचा जा सकता है और राजगीर के रास्ते भी। बोधगया से भी भुसुंडा के रास्ते मानपुर और वहां से मानपुर-सर्बहद्दा की सड़क पकड़कर पत्थरकट्टी और खुखरी पहुंचा जा सकता है। पत्थरकट्टी का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन इस्लामपुर है। राजगीर और गया रेलवे स्टेशन भी पत्थरकट्टी के नजदीक है जहां से एक-डेढ़ घंटे में वहां पहुंचा जा सकता है।

गया के साथ पत्थरकट्टी का एक महत्वपूर्ण संबंध है। वर्तमान में यह संबंध बाजार का है। पत्थरकट्टी के पाषाण शिल्पी अपनी मूर्तियों और घरेलू उपयोग के पाषाण उत्पादों को गया और बोधगया के बाजार में बेचते हैं। लेकिन, पत्थरकट्टी का इतिहास गया के विश्वविख्यात विष्णुपद मंदिर से जुड़ा है जिसका जीर्णोद्धार अठाहरवीं सदी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर के विशेष निमंत्रण पर जयपुर से गया आए करीब 1300 गौड़ ब्राह्मण पाषाण शिल्पियों ने किया था। मंदिर के जीर्णोद्धार का काम पत्थरकट्टी के ही काले पत्थरों को तराशकर किया गया था। कहा जाता है कि शिल्पियों को इसके लिए सघन घनत्व वाले पत्थरों की जरूरत थी और इसके लिए उन्होंने असम तक छानबीन की। अंतत: मंदिर के जीर्धोद्धार के लिए उन्होंने पत्थरकट्टी पहाड़ के काले पत्थरों को ही उपयुक्त पाया। कार्य संपन्न होने के पश्चात् अनेक शिल्पी जयपुर वापस लौट गये और अनेक पत्थरकट्टी में ही बस गये। अहिल्याबाई होल्कर के गुजरने के बाद उन्हें स्थानीय अटारी महाराज और अन्य राजाओं का संरक्षण मिला और यह संरक्षण अटारी महाराज के बाद भी जारी रहा जिससे उनका कारोबार तीन-चार पीढ़ियों तक खूब फला-फूला। लेकिन, बीसवीं सदी के मध्य में फैले जब देश को आजादी मिली, राजशाही का अंत हो गया और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपजी परिस्थितियों से देश में आर्थिक संकट गहरा गया, तब सरकारी और राजकीय संरक्षण के अभाव में उनकी आर्थिक स्थिति जीर्ण-शीर्ण हो गयी। इन परिस्थितियों में उन्होंने वापस जयपुर की ओर पलायन शुरू किया और उसकी तीव्रता इस तरह की थी कि 1961 तक उनकी जनसंख्या डेढ़ सौ से भी नीचे पहुंच गयी।

1961 की जनगणना में मौजा कटारी की कुल जनसंख्या 1,226 दर्ज की गयी थी। जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक कटारी-पत्थरकट्टी और झरहा गांव में एक भी गौड़ ब्राह्मण शिल्पी परिवार नहीं था जबकि पत्थरकट्टी गांव में सिर्फ 27 परिवार थे जिनके सदस्यों की कुल संख्या 141 थी। इनमें कई एकल परिवार भी थे। एमएसएमई को 2013 में जमा की गयी उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में गौड़ ब्राह्मण शिल्पियों के सिर्फ चार परिवार पत्थरकट्टी में थे। अर्थात् 1961 से 2013 के समय अतंराल में 27 में से 23 परिवार वापस जयपुर लौट गये थे। 2013 से लेकर 2019 के बीच एक और परिवार वापस अपने मूलस्थान को लौट गया है। अब पत्थरकट्टी में सिर्फ तीन गौड़ ब्राह्मण शिल्पी परिवार हैं जिनके सदस्यों की कुल संख्या 90 के आसपास है। जहां तक गांव की बसावट का प्रश्न है, इस गांव में शुरुआती तौर पर सिर्फ गौड़ ब्राह्मण परिवार थे। अब यहां विभिन्न जातियों के लोग हैं जिनमें गौड़ ब्राह्मण के अलावा राजपूत, भूमिहार, सोनार, दुसाध, भूइंया, अहिर, कोइरी, पासी, चमार, धोबी, नऊ, तेली, बरही, हलवाई, ब्राह्मण, कुम्हार और कायस्थ भी शामिल हैं। इनमें गौड़ ब्राह्मणों को सबसे ऊंचा दर्जा प्राप्त है।

2018 में पत्थरकट्टी की अपनी यात्रा के दौरान कुछ स्थानीय लोगों से बातचीत में यह जानकारी सामने आयी थी कि करीब पांच-सौ साल पहले मुसलमान शासकों ने पत्थरकट्टी को बसाया था। इस जानकारी के आलोक में यह बात भी बताते चलें कि पत्थरकट्टी के आसपास अनेक गांवों में मुस्लिम आबादी है और उनके नाम भी मुस्लिम हैं। मसलन – नियामतपुर, खिजिरसराय, इस्लामपुर आदि। इतना ही नहीं, पत्थरकट्टी में अनेक बार भवनों की आधारशिला रखने और कुओं की खुदाई के दौरान नरकंकाल और हड्डियां प्राप्त हुई हैं। स्थानीय सरकारी स्कूल की आधारशिला रखते समय भी खुदाई में अनेक बर्तनों और टाइलों के टुकड़ों के अनेक बहुमूल्य पत्थर भी मिले। इनसे पता चलता है कि किसी समय में स्थानीय समाज उन चीजों का प्रयोग कर रहा था। इस बारे में विस्तृत जानकारी स्टेट आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट से जुटायी जा सकती है। पत्थरकट्टी के दलेल और पराजित खदान के पास भी कई ऐसे ढांचे मिले जिससे वहां मस्जिद या दरगाहों की उपस्थिति का पता चलता है।

पत्थरकट्टी में गौड़ ब्राह्मण शिल्पियों के पहुंचने और बसने के बाद अन्य जाति के लोगों ने भी धीरे-धीरे वहां बसना शुरू किया जिनमें राजपूत, भूमिहार, कायस्थ, कोयरी, अहिर जाति के लोग पहले आये। भूमिहार नवादा के बज्र इलाके से आये और केनार गांव से कोयरी आये थे। गौड़ ब्राह्मणों के साथ इन दो जातियों के लोग सबसे पहले बसे। कोयरी जाति के लोगों के पत्थरकट्टी में बसने के बाद केनार गांव से ही ब्राह्मण समाज के लोग भी वहां पहुंचे। वे स्थानीय मुस्लिम जमींदार से प्रताड़ित थे। राजपूत, कायस्थ, दुसाध, सोनार आदि जातियां उनके बाद वहां बसीं। पत्थरकट्टी में सबसे बाद में बसने वाली जातियों में पासी अंतिम थे जो 1940 के आसपास तौंसा गांव से आकर वहां बसे।

इन सबके अलावा हलवाई जाति के लोग वहां तीन पीढ़ियों से रह रहे हैं। कहा जाता है कि वे तेलहारागंज से आये थे, जबकि भूइयां जाति के लोग दो पीढ़ी से पत्थरकट्टी में रह रहे हैं। बनिया जाति के लोग पत्थरकट्टी नियामतपुर के पास के गांव बनवारीगंज से वहां आये थे जबकि तेली समुदाय के लोग मूल रूप से रत्ना गांव में रह रहे थे। वहां से वे बनवारीगंज आए और अंतत: पत्थरकट्टी में आकर बस गये। इस्लामपुर के कोचर गांव से भी तेली समाज के लोग पत्थरकट्टी आए जबकि दुसाध समुदाय के लोग बहोरमा बाजार के पास के गांव देय से पत्थरकट्टी पहुंचे और गौड़ ब्राह्मण परिवारों की तरह आज वहां के स्थायी निवासी हैं और जिनकी संख्या अब महज तीन रह गयी है और वे भी वापस जयपुर की ओर पलायन करने का मन बना रहे हैं।

References:

Personal interview with Ravindranath Gaur, Sunil Kumar, 2018, Patharkatti, Gaya.
Need Assessment Survey Report, MSME Design Clinic Scheme, 2013, Upendra Maharathi Shilp Anusandhan Sansthan, Patna.
Census of India, 1961, Volume IV, Bihar, Craft Survey Report: Stoneware Craft of Patharkatti Village (District Gaya)

Other links:

Photo Documentation: Patharkatti, Village of Stone Carvers, Gaya, Bihar
पत्थरकट्टी,1940–1970: परंपरा और परिस्थितियों के बीच फंसा पाषाण शिल्प
पत्थरकट्टी: पाषाण शिल्प, परंपरागत डिजाइन और कच्चा माल के स्रोत

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