‘लोक’ और ‘दलित’: व्युत्पत्ति, अर्थ एवं विविध प्रयोग

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Painting on Dalit subject, Savi Sawarkar, Artist, Delhi.  Photo credit: https://wecur8.wordpress.com/
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लोक’ और ‘दलित’ न केवल अलग-अलग शब्द हैं बल्कि उनके प्रयोगों के संदर्भ भी अलग-अलग हैं। ‘लोक’ अत्यंत ही प्राचीन शब्द है जबकि दलित शब्द अपेक्षाकृत उससे नया।

सुनील कुमार
कला शोधार्थी, लोक कलाओं के अध्ययन में विशेष रुचि

“निम्न-कुल में जन्मे इस बच्चे ने तुमसे अधिक अंक हासिल किए हैं इसलिए तुमने अपनी और हमारे परिवार की प्रतिष्ठा खो दी है।” इस कथन में जिस निम्न-कुल के बच्चे का जिक्र है, वह मेरे पिता हैं। एक बार मेरे पिता मुझे अपने स्कूल के दिनों की एक घटना के बारे में बता रहे थे कि किस तरह उनके मित्र के पिता ने उनके मित्र को डांटा था। मेरे पिता तब वहां खड़े भय से कांप रहे थे, जब पूरे इलाके में अव्वल आने की खबर से उन्हें प्रसन्न होना चाहिए था, वह दहशत में थे। उनका अपराध यह था कि एक आदिवासी परिवार में पैदा होने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई-लिखाई में उत्कृष्टता हासिल की थी”।

फॉरवर्ड प्रेस की वेबसाइट पर ‘दलित’ शब्द के बचाव में एक आदिवासी का विचार’ आलेख आज भी देखा जा सकता है जहां लेखक स्वयं के अनुभव को व्यक्त कर रहा है। यह आलेख 2018 में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के उस आदेश के बाद प्रकाशित हुआ था, जिससे सरकारी स्तर पर या कहीं भी दलित शब्द के प्रयोग, जिसमें लिखना और बोलना दोनों शामिल है, उसकी वर्जना कर दी गयी है और आश्चर्यजनक रूप से अनुसूचित जाति के व्यक्ति के आगे उसकी जाति का नाम लिखे जाने की अनिवार्यता कर दी गयी। बहरहाल, यह शब्द लोकसमाज में अब गहरे पैबस्त है और इसकी एक बड़ी वजह इसका प्रतिनिधि स्वरूप है, जिसमें तमाम शोषित-वंचित पददलित जातियां अपने लिए सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक उत्थान हेतु अपना आधार तलाशती हैं।

ऊपर ‘निम्नकुल के बच्चे’ का उद्धरण वर्तमान समाज की सच्चाई है और वह एक आम घटना है क्योंकि उसमें विचलित होने जैसा कुछ भी नहीं दिखाई देता। वर्तमान प्रगतिशील समाज भी उसे एक सामान्य घटना मानकर भूल जाना चाहता है और उसकी तरफ चेहरा तक नहीं करना चाहता क्योंकि अगर वह ऐसा करता है, तब जातीय दुराग्रह का उसका घृणित चेहरा बेपर्दा होगा और वह ऐसा नहीं चाहेगा।

फोकार्टोपीडिया पर प्रकाशित आलेख लोकगाथा राजा सलहेस की सामाजिक प्रासंगिकता के आलोक में हमारे कुछ मित्रों ने ‘लोक’ और ‘दलित’ शब्दों की व्युत्पत्ति और प्रयोग पर कुछ जिज्ञासाएं व्यक्त कीं और जानकारियां मांगीं। उन्होंने जानना चाहा है कि ‘लोक’ और ‘दलित’ शब्द के प्रयोग का प्रथम साक्ष्य कितना पुराना है? इसी क्रम में यह बात भी सामने आयी कि ‘दलित शब्द आधुनिक भारत के समय की अवधारणा है’ और ‘सलहेस के साथ (सलहेस के साथ (दलित) जोड़ना लोक नायकों का राजनीतिकरण मात्र है’। कुछ लोगों का मानना है कि ‘लोक’ और ‘दलित’ दोनों शब्दों का एक साथ प्रयोग हास्यास्पद लगता हैं। इस आलेक में चर्चा ‘दलित’ शब्द की अवधारणा और ‘लोक’ और ‘दलित’ शब्द के एक साथ प्रयोग की है।

‘दलित’ के प्रयोग और उनमें निहित भावार्थ की चर्चा से पूर्व ‘लोक’ और ‘दलित’ शब्द के एक साथ या अलग-अलग प्रयोगों के संदर्भ में उसकी व्युत्पत्ति और अर्थ को जानना महत्वपूर्ण होगा क्योंकि तभी उनमें निहित भावार्थ की व्यापकता भी दृष्टिगोचर होती है।

लोक और दलित: व्युत्पत्ति एवं अर्थ व प्रयोग

‘लोक’ और ‘दलित’ न केवल अलग-अलग शब्द हैं बल्कि उनके प्रयोगों के संदर्भ भी अलग-अलग हैं। ‘लोक’ अत्यंत ही प्राचीन शब्द है और उसका प्रयोग आदिकाल से होता आया है। ‘लोक’ शब्द संस्कृत ‘लोक’ (दर्शन) धातु में ‘घन्’ प्रत्यय जोड़ने से निष्पन्न हुआ है। इसका लट् लकार में अन्य पुरुष एकवचन रूप ‘लोकते’ होता है। यानी, जो जन-समुदाय ‘देखने’ के कार्य में सम्मिलित होते हैं, उन्हें ‘लोक’ कहा जाता है।

‘दलित’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘दल’ धातु हुई है, जिसका अर्थ तोड़ना, हिस्से करना और कुचलना है। ‘दल’ + ‘क्त’ अर्थात् ‘दल’ + ‘क्त’ प्रत्यय का अर्थ ‘है’ तो ‘दलित’ शब्द विशेषण का रूप ले लेता है। हिन्दी व्याकरण के अनुसार ‘दल + इत’ से दलित विशेषण बनता है।

भारतीय परंपरा में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग प्राचीनकाल से चला आ रहा है। ऋग्वेद में ‘लोक’ शब्द का जीव और स्थान के अर्थों में प्रयोग मिलता है – पदभ्यां भूर्मिदि्दश: श्रोत्रात्तथा लोकां अकल्पयन् – (ऋग्वेद 10/90/94)। ऋग्वेद की ही पुरुष सूक्त के 10-90 मंत्र में कहा गया है, “सहस्तशीर्षा पुरुष: सहसत्राक्ष: पात्” अर्थात् ‘लोक’ एक विराट पुरुष है, जिसके हजारों सिर, हजारों नेत्र और हजारों पैर हैं। इसका अर्थ साधारण जन-समाज यानी लोक है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में ‘लोक’ के बारे में लिखा है कि अज्ञानरूपी अंधकारों में लिप्त लोगों को यह ग्रंथ ज्ञानरूपी अंजन लगाकर उनके अज्ञान को नष्ट कर देगा।

प्राकृत और अपभ्रंश में लोकसत्ता, लोअप्पवाय आदि शब्दों का प्रयोग अभिजात्य आचारों से भिन्न लौकिक नियमों के संदर्भों में प्राप्त होते हैं। चाणक्य सूत्राणि में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग साधारण जनता के लिए किया गया है। सम्राट अशोक ने अपनी प्रजा के संदर्भ में ‘लोक’ का प्रयोग किया है। पाणिनी ने अनेक शब्दों की निष्पत्ति के क्रम में लिखा है कि इस शब्द का रूप और अर्थ ‘वेद’ में इस प्रकार है परंतु ‘लोक’ में इस शब्द का रूप और अर्थ भिन्न समझा जाना चाहिए। वे ‘लोक’ और ‘सर्वलोक’ की चर्चा करते हैं। पातंजलि ने भी ‘लोक’ और ‘वेद’ का विरोधी प्रसंगों में प्रयोग किया है। उपनिषदों में भी ‘लोक’ शब्द की चर्चा मिलती है – बहु व्याहितो वा अयं बहुशो लोक: (यह लोक अनेक तरह से फैला हुआ है, प्रत्येक वस्तु में यह व्याप्त है)। महाभाष्य में आता है – केषां शब्दानां ? लौकिकानां वैदिकानां च। एकस्य शब्दस्य बहयो अपभ्रंशा। भरतमुनि अपने नाट्यशास्त्र के चौदहवें अध्याय में परस्पर भिन्न प्रवृत्तियों – ‘नाट्यधर्मी’ और ‘लोकधर्मी’ का उल्लेख करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि ‘लोक’ और ‘वेद’, ‘लौकिक’ और ‘वैदिक’ दो भिन्न जीवन संसार एवं जीवन दृष्टि रही है। ‘लोक’ और ‘वेद’ का अंतरविरोधी संबंध सिद्ध करता है कि ‘वेद’ के बाहर के भी विषय मौजूद थे जो वस्तुत: ‘लोक’ के विषय थे।

‘लोक’ शब्द की अनेक परिभाषाएं मिलती हैं । उन्हें समग्रता से देखें तो दो परिभाषाएं ज्यादातर परिभाषाओं को अपने भीतर समेटे हुई हैं। उनमें पहली परिभाषा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की है जिनके लिखा कि ‘लोक’ शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है, बल्कि नगरों और गांवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं हैं। ये लोक-परिष्कृत, रुचि-संपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएं आवश्यक है, उनको उत्पन्न करते हैं’। जबकि, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने ‘लोक’ शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया है – आधुनिक सभ्यता से दूर अपने प्राकृतिक परिवेश में निवास करने वाली तथाकथित अशिक्षित और असंस्कृत जनता को लोक कहते हैं, जिनका आधार विचार एवं जीवन परंपरायुक्त नियमों से नियंत्रित होता है। उन्होंने लिखा कि जो लोग संस्कृति तथा परिष्कृत लोगों के प्रभाव से बाहर रहते हुए अपनी पुरातन स्थिति में वर्तमान हैं, उन्हें लोक की संज्ञा प्राप्त है।  

दूसरी तरफ, ‘दलित’ का अर्थ अलग-अलग शब्दकोशों के मुताबिक, मसला हुआ, चिरा हुआ, फूटा हुआ, मर्दित, दबाया हुआ, रौंदा हुआ, खण्डित, विनिष्ट किया हुआ है। अपने व्यापकतम अर्थों में ‘दलित’ शब्द उन जातियों एवं वर्गों का समुच्च है, जो सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर है और जिसे ऊपर की जातियां या अभिजात्यवर्ग विकसित नहीं होने देता है, दलित कहलाता है।

प्रख्यात मराठी दलित साहित्यकार शरणकुमार लिंबाले ने गांव की सीमा से बाहर रहने वाली सभी अछूत, आदिवासी, भूमिहीन, खेत मजदूर, श्रमिक, दुखी जनता, बहिष्कृत जातियों को दलित कहा है, जबकि जाने-माने दलित साहित्यकार ओमप्रकाश बाल्मिकी के अनुसार, ‘दलित’ का अर्थ है, ‘जिसका दमन हुआ हो, दबाया गया हो, उत्पीड़ित, शोषित, सताया हुआ, गिराया हुआ, उपेक्षित, घृणित, रौंदा हुआ, मसला हुआ, कुचला हुआ, विनिष्ट, मर्दित प्रस्त हिम्मत, हतोत्साहित, वंचित आदि’ इसके अलावा अलग-अलग कोशों में ‘दलित’ शब्द का अर्थ इस प्रकार है –

हिन्दी विश्वकोश, एस.कुमार, माधुरी सक्सेना, कमल दधीच – जिसका दलन हुआ हो, जो दबाया या कुचला गया हो, जो दीन-हीन अवस्था में पड़ा हो। कुचला या मसला हुआ, दबाया या रौंदा हुआ, मर्दित, नष्ट-भ्रष्ट, दली हुई दाल या अन्न। लोकभारती बृहद प्रामाणिक हिन्दी कोश, आचार्य रामचंद्र वर्मा – समाज का वह वर्ग जो सबसे नीच माना गया हो या दुखी और दरिद्र हो और जिसे उच्च वर्ग के लोग उठने न देते हों, जैसे, भारत की छोटी या अछूत मानी जानेवाली जातियों का वर्ग। हिन्दी साहित्य कोश, भाग-1, डॉ. धीरेंद्र वर्मा – समाज का निम्नतम वर्ग, जिसको विशिष्ट संज्ञा आर्थिक व्यवस्थाओं के अनुरूप ही प्राप्त होती है। उदहरणार्थ- दास-प्रथा में दास, सामन्तवादी व्यवस्था में किसान, पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर समाज का दलित वर्ग है।

लोकभारती बृहद प्रामाणिक हिन्दी कोश– ‘दलित’ विशेषण, (संस्कृत स्त्री.दलित) – मसला, रौंदा या कुचला हुआ, नष्ट किया हुआ, दरिद्र और पीड़ित। प्रामाणिक पर्यायवाची कोश, डॉ. हरिवंश तरूण – कुचला हुआ, मर्दित, मसला हुआ, रौंदा हुआ, हतोत्साह, पस्तहिम्मत/अछूत, सर्वहारा। संक्षिप्त हिन्दी शब्द सागर, डॉ. रामचंद्र वर्मा – विनष्ट किया हुआ, मसला हुआ, मर्दित, दबाया, रौंदा, कुचला हुआ, खण्डित।

व्यायव्याकरणतीर्थ परमतदुमह (प्राकृत शब्दकोश), शेट्टी हरगोविंददास – ‘दल’ – (अक) विकसना, फटना, खण्डित होना, द्विधा होना, चूर्ण करना। ‘दल’ – (सक) चूर्ण करना, टुकड़े करना, विदारना। ‘दल’ – (नृप) सैन्य, लश्कर, पत्र, पत्ती। ‘दल’ – (दलित) प्राकृतिक में दलित हदयं गाढ़ी द्वैंग द्धिधा तु न विधते। (वेदनाओं के कारण हृदय के टुकड़े होते हैं, नाश नहीं)। आधुनिक हिन्दी कोश, गोविंद चातक – दलित भू.कृ. जिसका दलन हुआ हो, कुचला हुआ, मर्दित, खण्डित, दमित, विशेषत: समाज का वर्ग निम्नवर्ग जिसे सामाजिक न्याय और आर्थिक सुविधाएं प्राप्त न हों।

ऐतिहासिक संदर्भ

‘लोक’ के उलट ‘दलित’ शब्द का प्रयोग ऋग्वेद या अन्य प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता है। हालांकि, जेएनयू में समाजशास्त्र के प्रोफेसर विवेक कुमार के मुताबिक, ‘दलित शब्द बौद्ध ग्रंथ कुलुवग्गा विनय पिट्टका में भी पाया जाता है। लेकिन, ऋग्वैदिक काल के पश्चात् दल, दास, दस्यु, शूद्र, अतिशूद्र, चाण्डाल, अंत्यज, आदि शब्द का प्रयोग मिलता है, जिन्हें ‘दलित’ शब्द का पूर्ववर्ती माना जाता है।

‘दलित’ शब्द आधुनिक अवधारणा है, लेकिन दलितपन प्राचीन है। ‘दलित’ शब्द का आधुनिक संदर्भ व्यापक है। आज के संदर्भों में यह शब्द शूद्र, अतिशूद्र, चाण्डाल, मेहतर, हरिजन समेत सभी अछूत जातियों के लिए रूढ़ हो गया है। लेकिन, ‘दलित’ शब्द अपने भावार्थ रूप में पहली बार ऋग्वैदिक काल के अंत में दिखता है, जब वर्ण व्यवस्था की स्थापना करने वाले वैदिक समाज में ब्राह्मण, राजन और वैश्य के साथ शूद्र भी जुड़ते हैं। परवर्तीकालीन पुरुष सूक्त (X.90) में पहली बार शूद्र शब्द का प्रयोग मिलता है;

ब्राह्मणो अस्य मुखमासीत बाहूराजन्य कृत: । ऊरू तदस्य यदू वैश्य पदभ्यां शूद्रो अजायत: ।। अर्थात् प्रजापति के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य तथा पैरों से शूद्र का उत्भव हुआ।

आमतौर पर यह माना जाता है कि ऋग्वैदिक में गौर वर्ण वाले आर्यों ने श्याम वर्ण वाले मूल निवासियों या अनार्यों पर विजय प्राप्त की और उन्हें दास और दस्यु बनाया। ऋग्वैदिक काल के अंत में जब वर्ण व्यवस्था जातीय स्वरूप ले रही थी, तब ये ही दास और दस्यु शूद्र बन गये और जिनका उल्लेख पुरुष सूक्त में मिलता है। हालांकि, उत्तरवैदिक काल में भी वर्ण व्यवस्था बहुत जटिल नहीं थी। राज्याभिषेक से जुड़े अनुष्ठानों में शूद्र हिस्सा लेते थे। उन्हें आर्यों का ही वंशज माना गया है। रथकार या रथ निर्माता शूद्र माने गये लेकिन उन्हे उच्चाधिकार और उपनयन संस्कार का अधिकार था। लेकिन, अन्य शूद्रों को इसका अधिकार नहीं था।

जाहिर है, शूद्र दो प्रकार के थे। पवित्र अथवा अनिर्वासित और निर्वासित। इनमें निर्वासित शूद्र निम्न कोटि के शूद्र थे और जिन्हें उत्तर काल में अछूत और जातिबहिष्कृत माना गया और परिगणित कहा गया।

डॉ. धीरेंद्र वर्मा हिन्दी साहित्य कोश में ‘अछूत’ शब्द को व्याख्यायित करते हैं – “’अछूत’ शब्द का तात्पर्य जानने के लिए यह जरूरी है कि पहले ‘छूत’ शब्द का अर्थ जाना जाए। ‘छूत’ शब्द का अभिप्राय है छूने का भाव, छूने की प्रक्रिया, किन्तु बाद में उसमें अर्थ-परिवर्तन हुआ और इसका अर्थ हुआ अस्पृश्य, अपवित्रता का भाव, विषिद्ध संक्रामक रोग या बीमारी। समाज में छूत अर्थात् छूने से फैलने वाली बीमारी के लिए यह शब्द रूढ़ हो गया, उसी के आधार पर छुआ-छूत व छूआछूत जैसे शब्द प्रचलित हो गये किन्तु अछूत में छूत का मूल अर्थ अर्थात् छाने का भाव व क्रिया ही सुरक्षित रहा। अत: अ (न) छूत (छूना) अर्थात् जो छूआ न जा सके, जो छूने योग्य न हो ऐसा व्यक्ति, वर्ण, जाति व समाज जिसके संपर्क (किसी रूप में) वर्णित हो, वही अछूत या अस्पृश्य कहलाता है।

बहरहाल, बौद्ध साहित्य और प्रारंभिक धर्मसूत्रों में निर्वासित शूद्रों की चर्चा मिलती है जो आर्यों की सेवा अनेक नीच एवं गंदे कार्यों के रूप में करते थे, फिर भी उन्हें आर्य जाति की परिधि से पूर्णत: बाहर समझा जाता था। ‘पंचम’ शब्द इन्हीं शूद्रों के लिए आता है। कई अनार्य मौलिक दल जिन पर आर्यों ने विजय पायी, उनके लिए ‘चाण्डाल’ शब्द का प्रयोग किया गया और जिसे बाद में अछूतों के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा।

शूद्र और अछूतों के अधिकार की चर्चा पौराणिक ग्रंथों में मिलती है। उनमें से एक गौतम धर्मसूत्र के मुताबिक शूद्रों को द्विज श्रेणियों की सेवा करनी चाहिए, उन्हें अपने स्वामी के अवशिष्ट भोजन ग्रहण करना चाहिए, उतारे हुए वस्त्र पहनना चाहिए और उनकी पुरानी सामग्री का प्रयोग करना चाहिए। अगर शूद्र नियमों का पालन नहीं करते, तो उसे अपराध माना जाता था और उन्हें क्रूर दण्ड दिया जाता था। दण्ड के संबंध में मनुस्मृति में कहा गया है;

एकजातिद्विजातीस्तु वाचा दारुणता क्षिपन । जिह्वाया: प्राप्नुयाच्छेदं जघन्य प्रभावो हि स: ।।240।।
नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्वोहेण कुर्वत: । निक्षेप्यो Sयोमय: शंकुर्ज्वलन्नास्ये दशाडुंगुल: ।।282।।
धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वत: । तप्तमासेचयेतैलम वक्ते श्रोते च पार्थिव: ।।282।।

अर्थात् द्विज को दारुण वचन से आक्षेप करने वाले शूद्रों का जीभ काट देना चाहिए क्योंकि वह नीच से उत्पन्न है, तीनों वर्णों के नाम तथा जाति का उच्चारण करनेवाले शूद्र के मुख में दस अंगुल लंबी जलती हुई लोहे की कील डालनी चाहिए और यदि अभिमान से शूद्र ब्राह्मण के लिए धर्म का उपदेश करे तो राजा उसके मुख और कान में औंटता हुआ तेल डाल दे।

शूद्रों को संपन्न होने की अनुमति नहीं थी और न ही उनके जीवन का कोई मूल्य था। शूद्र का वध करने वाले ब्राह्मण को उतना ही प्रायश्चित करना पड़ता था जितना कि किसी कुत्ते-बिल्ली के वध पर। उन्हें वेद-मंत्रों के श्रवण और उनके उच्चारण की आज्ञा नहीं थी। उन्हें मंदिर प्रवेश और रूढ़िवादी धर्म की सुविधाओं से वंचित कर दिया गया था। उनका भाग्योदय एक ही स्थिति में संभव था अगर वे ब्राह्मणों, गायों, स्त्रियों और बच्चों की सुरक्षा हेतु बलिदान दें।

पौराणिक महाकाव्यों में शूद्रों पर किये गये अनेक अत्याचारों का वर्णन मिलता है। जैसे, जातिगत शूद्र कर्म त्यागकर ब्राह्मण कर्म अपनाने की सजा के तौर पर भगवान राम ने शंबुक ऋषि की हत्या कर दी थी, महाभारत में द्रोण एकलव्य का अंगूठा इस वजह से दक्षिणा में मांगते हैं क्योंकि वह शूद्र था।

चाण्डालों की स्थिति ज्यादा विकट थी। नीति ग्रंथों के मुताबिक चाण्डाल को उन मृतकों के वस्त्रों को धारणा करना चाहिए जिनका दाह संस्कार उसके द्वारा किया जाय। उन्हें टूटे हुए बर्तनों में भोजन करना चाहिए और केवल लौह आभूषण धारण करना चाहिए। उच्च श्रेणी के व्यक्तियों को उनसे कोई निकट संबंध नहीं रखना चाहिए।

चाडांलों के लिए ‘अंत्यज’ शब्द का प्रयोग किया गया है, यानी निम्न जाति में जन्मा व्यक्ति। स्मृतियों में इसके कई प्रकार पाये जाते हैं। अत्रि ने सात अत्यजों के नाम दिये हैं जिनमें रजक (धोबी), नट (नाचनेवाली जाति), बरूड़ (बांस का काम करनेवाला), कैवर्त (मछली मारनेवाला), चर्मकार (चमड़े का काम करनेवाला), भेद और भील शामिल हैं।

महाजनपदकाल के बाद शूद्रों की स्थिति में थोड़ा बहुत परिवर्तन होता है। उन्हें पुराण और महाकाव्य पढ़ने की अनुमति मिलती है। मौर्यकाल में वे कृषि और व्यापार में शामिल होने लगे लेकिन दण्ड विधान नहीं बदलता है। अर्थशास्त्र के मुताबिक शुद्र का वह अंग जिससे वह किसी ब्राह्मण को मारता है, काट दिया जाना चाहिए। अगर कोई असुरक्षित ब्राह्मणी को भ्रष्ट करता है तो उसके क्षत्रिय होने पर उसे उच्चतम अपमान की सजा मिलनी चाहिए, वैश्य की संपत्ति छीन लेनी चाहिए और शूद्र को चटाई में लपेटकर जला देना चाहिए।

गुप्तकाल में शूद्रों की स्थिति पर इतिहासाकारों का मत है कि उन्हें इतना अस्पृश्य स्वीकार लिया गया था कि उन्हें नगर में प्रवेश करने पर लकड़ी का एक खटखटा बजाने के लिए बाध्य किया जाता था। साथ ही इस समय तक चाण्डालों ने स्वयं से नीच एक जाति खोज ली थी।

उत्तरवैदिक काल में जड़ होती वर्ण व्यवस्था धीरे-धीरे जाति प्रथा को जन्म देती है और सामाजिक व्यवस्थाओं के अनुपालन में मनुस्मृति से निर्देश पाती हैं। उसमें शूद्रों की स्थिति आधुनिक काल तक दयनीय बनी रहती है। उपरोक्त अर्थों, भावार्थों और संदर्भों में ‘दलित’ समाज व्यापक ‘लोक’ का एक हिस्सा है और इसी वजह से दोनों शब्दों का प्रयोग भी अलग-अलग किया जात है।

दलित’ शब्द का प्रयोग

शूद्रों के लिए ‘दलित’ शब्द का प्रयोग भी आधुनिक काल में होता है। माना जाता है कि मराठी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ ‘सतह’ या ‘तोड़कर’ या ‘घटाकर विभाजित किया हुआ’ है। यही अर्थ ईस्ट इंडिया कंपनी के आर्मी अफसर जे.जे. मोल्सवर्थ की 1831 में प्रकाशित मराठा-इंग्लिश डिक्शनरी में भी दिया गया है। दलित उद्धारक महात्मा ज्योतिबा फुले और फिर भीमराव अंबेडकर ने इस शब्द का प्रयोग अपने शुरुआती राजनीतिक भाषणों में किया। अंबेडकर बाद में इसकी जगह ‘डिप्रेस्ड क्लास’ अपना लेते हैं। सोशल सिस्टम और सोशल साइंस सेंटर, जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार के मुताबिक ‘यहीं से ‘दलित’ शब्द बना’। सरकारी कामकाज में ‘दलित’ शब्द 1919 में शामिल होता है।

एक धारणा यह भी है कि एनीबेसेन्ट ने सबसे पहले ‘डिप्रेस्ड’ शब्द का प्रयोग किया था और उन्होंने इसका आधार धार्मिक व्यवहार नहीं मानकर सामाजिक व्यवहार माना। महाराष्ट्र में अस्पृश्य को ‘पंचम’ कहा जाता है। 1921 से 1926 के बीच ‘दलित’ शब्द स्वामी श्रद्धानंद द्वारा प्रयोग किया गया, यह भी माना जाता है।

‘दलित’ शब्द को लोकप्रियता मिली 1972 के बाद जब महाराष्ट्र में उनका संगठन ‘दलित पैंथर्स, मुंबई’ बना जिसने इसका प्रयोग पिछड़ों और अति-पिछड़ों के संदर्भ में किया और महाराष्ट्र में सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने में सफलता पायी। हालांकि 1929 में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला भी अपनी एक कविता में ‘दलित’ शब्द का प्रयोग करते हैं, “दलित जन पर करो करुणा। दीनता पर उतर आये प्रभु, तुम्हारी शक्ति वरुणा”। इससे यह पता चलता है कि दलित शब्द का चलन उत्तर भारत में था, वह प्रचलित नहीं था।

उत्तर भारत में इस शब्द को प्रचलित करने का श्रेय जाने-माने दलित चिंतक चंद्रभान, कांशीराम को देते हैं। हालांकि, कांशीराम से पहले बाबू जगजीवन राम को दलित नेता के तौर पर राष्ट्रीय पहचान मिल चुकी थी और उप-प्रधानमंत्री तक बने। दलित शब्द इस वजह से भी लोकप्रिय हुआ कि इसका संबंध जाति विशेष से नहीं है, बल्कि यह सभी राष्ट्रीय स्तर पर दबी-कुचली और अछूत जातियों के लिए प्रयोग की जा रही है।

भारत के संविधान में दलित शब्द का प्रयोग नहीं है। वहां इस आशय में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति शब्द का प्रयोग किया गया है। फिर इस शब्द का प्रयोग 2008 तक आधिकारिक दस्तावेजों में किया जाता रहा है। 2008 में अनुसूचित जाति के लिए बने राष्ट्रीय आयोग ने राज्यों को निर्देश देकर आधिकारिक दस्तावेजों में दलित शब्द के प्रयोग पर रोक लगा दी। 2018 में केंद्र सरकार ने इस शब्द के प्रयोग पर पूण प्रतिबंध लगा दिया है। यह प्रतिबंध विवादों में है क्योंकि ज्यादातक दलित चिंतक एवं राजनेता इस शब्द के प्रयोग के पक्ष में खड़े दिखते हैं और इसकी वजह भी स्पष्ट है। प्रयोग के समयकाल की दृष्टि से भले यह शब्द आधुनिक काल का है, इसकी जड़ें वैदिक सभ्यता-संस्कृति में मिलती हैं और उसका प्रभाव आज भी गहरा दिखता है।

संदर्भ

सिद्धांत कौमुदी. प. 416. (वेंकटेश प्रेस, बम्बई, 1989 ई.)
गांधी-अंबेडकर और दलित-डॉ.महेश्वर दत्त, पृ. 32
ऋग्वेद – 10/9
दयानंद सरस्वती (व्याख्याता), ऋग्वेद – 10.90.12, भाग 2, पृ. 46
डॉ. उमेशचन्द्र, गौतम धर्मसूत्राणि, पृ. 59-60
श्री पं. जगदीशलाल शास्त्री, मनुस्मृति, पृ. 231
कौटिल्य, अर्थशास्त्र, उदयवीर शास्त्री (व्याख्याता), पृ. 94, 170
अदभुत भारत, ए.एल.बाशम
प्राचीन भारत का इतिहास, डी.एन. झा एवं कृष्ण मोहन श्रीमाली

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