लोकगाथा दीना-भद्री का कथानक: भाग-1

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Dina-bhaduri-Arariya, Bihar. Image credit: https://www.youthkiawaaz.com/2016/12/a-folklore-from-a-village-of-bihar/
Dina-bhaduri-Arariya, Bihar. Image credit: https://www.youthkiawaaz.com/2016/12/a-folklore-from-a-village-of-bihar/
दीना-भद्री लोकगाथा में दलित समुदाय के शोषण और उत्पीड़न की घटनाओं का केन्द्रीकरण है, उनके जीवन के अन्तर्विरोधों और संघर्षों का मानवीकरण है - हसन इमाम, संस्कृतिकर्मी, बिहार

दीना और भद्री दो मुसहर भाई थे। उनके पिता का नाम कालू सदा और माता का नाम निरसो था। दोनों भाई अपने माता-पिता से अगाध प्रेम करते थे। दीना की पत्नी का नाम रोदना था और भद्री की पत्नी का नाम सुधना था। इनका नाम हंसा-संझा भी बताया जाता है। दोनों भाई अपनी-अपनी पत्नियों से बहुत प्यार करते थे और उन्हें घर से बाहर मजदूरी करने के लिए नहीं भेजते थे। वे स्वयं दिनभर जंगल में शिकार करते, खाने को लाते, लेकिन अपने माता-पिता और पत्नी को बेगार खटने नहीं देते थे। कहा जाता है वो दोनों बहुत वीर थे। अस्सी मन का धनुष और चौरासी मन का तीर हमेशा अपने कंधे पर लटकाये रहते थे।

दीना और भद्री जिस नगर में रहते थे उस नगर का नाम जोगिया नगर था। उस नगर का राजा कनक सिंह धामि था। वह बड़ा ही अत्याचारी और निरंकुश था और अपने राज्य में रहने वाली प्रजा से बेगार कराता था। जो कोई भी बेगारी नहीं करता, उस पर राजा बेइंतहा जुल्म ढाता था।

राजा कनक सिंह धामि की एक बहन थी जिसका नाम बचिया था। बचिया तंत्रमंत्र में सिद्धहस्त थी। वह दीना-भद्री को नीचा दिखाने के उद्देश्य से अपने राजा भाई से कलहवाकर नगर में एक पोखरा और अपनी जादू से उसमें पनियांदराज का एक जोड़ा डलवा दी। इस तरह जो भी व्यक्ति उस पोखरा में स्नान के लिए आता, पनियांदराज उसे डंस लेता था। नगर के जानवर भी जब उसमें पानी पीने जाते तो वह उन्हें खा जाता था। धीरे-धीरे वह पोखरा नगर के पशुओं के मृत शरीर से भर गया और उससे दुर्गंध उठने लगी। तब नगर को लोग उस समस्या से निजात पाने के लिए दीना-भद्री के पास गये। नगर के लोगों के आग्रह पर दोनों भाइयों ने पोखर से जानवरों के सारे मृत शरीर को बाहर निकाल दिया जिससे नगर वासियों को राहत मिली।

इस घटना से बचिया खुद को बहुत अपमानित महसूस की। वह दीना-भद्री को सबक सिखाने के लिए षडयंत्र रचने लगी। उसने अपने भाई राजा कनक सिंह धामि को दीना-भद्री से बेगार कराने के लिए उकसाया। राजा ने अपने चौर बरेला में तमाम प्रजा को बेगारी में खेती करने का हुक्म दिया। भोर होते ही सभी औरत और मर्द बेगार करने किए चौर बरेला पहुंचे। यहां तक परसौती महिलाएं भी अपने दुधमुंहे बच्चे के साथ बेगार करने के लिए विवश थीं। जब लोग बेगार कर रहे थे तब बचिया अपने मंत्र से एक बुढ़िया का वेश धारण कर चौर पहुंचती है और बड़बड़ाने लगती है कि कैसा बेवकूफ गिरहत है। हलवाहा के साथ-साथ दो जवान कुदाल चलाने वाला भी बुला लेता ताकि वह खेत की आड़ी (मेड़) को अच्छे से काटकर मिला देता। बुढ़िया बनी बचिया ने हलवाहे को भी यह सुनाया और कहा कि कनकसिंह धामि को आने दो, उसको बताते हैं कि जोगिया नगर में कालू सदा का बेटा दीना-भद्री बहुत बलशाली है। उसे बुला लावे कुदाल चलाने के लिए। बुढ़िया वेशधारी बचिया यह ताना देते हुए वहां से चली जाती है।

इस बीच कनकसिंह धामि चौर बरेला पहुंचता है जहां हलवाहा उस बुढ़िया द्वारा किये गये उपहास की बात उसे बताता है। हलवाहे की बात सुनकर आगबबूला राजा ताड़ की बारह पसेरी की छड़ी लेकर दीना भद्री के घर पहुंचता है। दीना-भद्री की मां निरसो चनन गाछ के नीचे बैठकर सीसी का पथिया बीन रही थी। कनकसिंह निरसो से पूछता है कि तुम्हारा बेटा कहां है? निरसो डर के मारे चुप्पी साध लेती है। निरसो की चुप्पी से बौखलाकर राजा कनकसिंह उसे अपने बारह पसेरी के जूते से मारता है जिससे निरसो मुंह के बल गिर जाती है और जोर-जोर से विलाप करने लगती है। ऊधर उत्तर नहीं पाकर राजा कनकसिंह दीना-भद्री की खोज में आगे बढ़ जाता है।

दीना-भद्री तब घर में ही सो रहे थे। भद्री सपने में देखता है कि उसकी मां जार-बेजार रो रही है। वह हड़बड़ाकर उठता है और दीना को भी जगाता है। दोनों अपनी मां को देखने पेड़ के पास जाते हैं तो पाते हैं कि वो जोर-जोर से विलाप कर रहे हैं। निरसो पूरी बात दीना-भद्री को बताती है जिससे दोनों भाई गुस्से से भर जाते हैं। तभी उनकी नजर राजा कनकसिंह पर पड़ती है जो वहां से जा रहा था। वे दौड़कर जाते हैं और राजा के पीठ पर फांदकर उसकी डांर पर पैर मारते है और उसे पटक देते हैं। तब कनकसिंह अपनी जेब से जादू की किताब निकालकर साबरमंतर (एक तरह का जादू) पढ़ने लगता है, लेकिन इससे पहले कि वह अपने जादू से दीना-भद्री पर प्रहार कर पाता, दोनों भाई उस पर हमला बोल देते हैं। तब कोई चारा नहीं देख, राजा कनकसिंह वहां से भाग खड़ा होता है। इसके बाद दीना-भद्री चौर बरेला जाकर बेगारी कर रहे लोगों से काम बंद करवा देते हैं और लोगों को बेगार खटने से छुट्टी मिल जाती है।

दीना और भद्री को जान से मारने की नीयत से बचिया तब राजा सलहेस और दीना-भद्री की आराध्य देवी बहोसरि से छलपूर्वक यह प्रतिज्ञा करा लेती है कि वे दोनों बचिया के उद्देश्य पूर्ति में सहायक बनेंगी। जब राजा सलहेस और देवी बहोसरि को पता चलता है कि बचिया ने दीना-भद्री को उनके हाथों मृत्यु का शपथ करा लिया है तो वो दोनों बहुत दुखी होते हैं। चूंकि दोनों ने प्रतिज्ञा की थी इसलिए वो दोनों दीना-भद्री को मारने के षडयंत्र में अनचाहे भी शामिल होते हैं। देवी बहोसरि दोनों भाइयों को सपने में बताती है कटैया खाप नामक जंगल में एक सुआर मरा पड़ा है। दोनों भाई उस जंगल में जाने के लिए तत्पर होते हैं। माता निरसो को ननिहाल भेजकर और अपने मामा बुहरन को साथ लेकर दीना-भद्री कटैया खाप की ओर प्रस्थान करते हैं। जंगल में बहुत तलाशने पर भी उन्हें सूअर नहीं मिलता है। बुहरन पेड़ पर चढ़कर देखता है कि दूर में एक हिरण का बच्चा है। दोनों भाई उस बच्चे के पास जाते हैं, तब हिरण का बच्चा बाघ बन जाता है और दीना-भद्री से उसकी लड़ाई शुरू हो जाती है। एक-एक करके सारा तीर खत्म हो जाता है लेकिन लड़ाई खत्म नहीं होती है। अंत में दोनों भाई उस बाघ से शारीरिक युद्ध करने लगते हैं और बाघ के शरीर को दो भागों में चीर देते हैं। तब राजा सलहेस वहां गीदड़ बनकर उपस्थित होते हैं और बाघ के अलग-अलग शरीर को एक कर देते हैं जिससे बाघ जिंदा हो जाता है।  

सात दिन और सात रात युद्ध चलता है जिसके जिसमें बाघ जीत जाता है, दीना-भद्री मारे जाते हैं। जंगल में दोनों भाइयों का शव पड़ा रहता है, कोई अंतिम संस्कार करने वाला वहां नहीं है। अंतिम संस्कार नहीं होने से दोनों भाई प्रेतात्मा बन जाते हैं और अपने संस्कार की तैयारी में जुट जाते हैं। प्रेतात्मा बने दोनों भाई मुनष्य वेश धारण कर मुसहरों की बस्ती एकौशी पहुंचते हैं और बस्ती के लोगों के समक्ष जंगल में पड़े दीना-भद्री के शव का अंतिम संस्कार का प्रस्ताव रखते हैं। एकौशी के लोग दीना-भद्री के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं। तब दीना-भद्री एक फकीर का वेष धरकर अपने गांव पहुंचते हैं और एक वणिक को सारी कहानी बताते हैं। उसके बाद कफन और एवं दाह-संस्कार की अन्य सामग्रियों का प्रबंध होता है, दाह संस्कार संपन्न होता है और फिर भोज का आयोजन किया जाता है।

दीना-भद्री के प्रेतात्मा बनने के बाद अनेक छोटी-छोटी कथाएं जुड़ती हैं। लोककथा के मुताबिक दाह-संस्कार से पूर्व दीना-भद्री प्रेत योनी में समाज की भलाई के लिए अनेक लड़ाईयां लड़ते हैं और बुराई के खिलाफ उनका संघर्ष तेज होता है। जैसे, वह सबसे पहले बचिया का पीछा करते हैं। बचिया दीना-भद्री से बचने के लिए कोशी पर भाग जाना चाहती है, लेकिन दीना-भद्री उसे पकड़ लेते हैं और तलवार से उसकी गरदन काट देते हैं। उसके बाद वे राजा कनकसिंह धामि के पास पहुंचते हैं और युद्ध करके राजा और उसकी रानी को मार डालते हैं।

क्रमश:

लोकगाथा दीना-भद्री का कथानक: भाग-2

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