लोकगाथा सीरीज: सोरठी-बृजभार का कथानक

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A scene of folk theatre Sorathi-Brijbhar. Image details awaited.
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लोकगाथा सोरठी बृजभार संपूर्ण बिहार और अवध क्षेत्र में लोकप्रिय है। माना जाता है कि इसकी शुरुआत 1100 - 1325 ई. के बीच हुई जब नाथपंथ का प्रभाव पूरे क्षेत्र में प्रबल था।

सोरठी, सोरठपुर के राजा उदयभान सिंह की बेटी थी। उसकी माता का नाम कमलावति था। जब सोरठी का जन्म हुआ, तब पुरोहित को उसके नामकरण के लिए बुलाया गया। पुरोहित सोरठी की कुंडली और हस्तरेखा देखकर आश्चर्यचकित रह गया। सोरठी बुद्धि-विवेक और सद्गुणों की खान होगी, ऐसी कुंडली देखकर पुरोहित कुंठित हो गया। उसने कुटितला का परिचय देते हुए उदयभान सिंह से कहा कि वह राज्य के लिए अशुभ है और उसे नदी में फेंक देना चाहिए।

राजा को पुरोहित पर विश्वास था। नन्ही सोरठी को नदी में फेंक दिया जाता है। नदी में बहती नन्ही सोरठी केंका नाम के एक कुम्हार को मिलती है जो कि नि:संतान था। केंका की खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। वह बड़े जतन से उस बच्ची का लालन-पालन करता है। सोरठी ठहरी गुणों की खान, ऐश्वर्य उसकी किस्मत में लिखा था। इसलिए सोरठी के भाग्य से केंका कुम्हार के धन और ऐश्वर्य में खूब वृद्धि होने लगी। धीरे-धीरे सोरठी भी बड़ी हो गयी, खूब सुंदर, रूपवान और आकर्षक यौवन से परिपूर्ण।

एक दिन उस पुरोहित की नजर सोरठी पर पड़ी। वह सोरठी को पहचान गया और फिर से उसके खिलाफ कुचक्र रचने में जुट गया। उसने नीचता का परिचय देते हुए राजा उदयभान सिंह के सामने सोरठी के रूप लावण्य का खूब बखान कर, उसे सोरठी से विवाह करने के लिए राजी कर लिया।

उदयभान सिंह बारात लेकर केंका कुम्हार के घर पर पहुंचा। सोरठी भविष्यद्रष्टा थी। इसलिए सिंदूरदान के समय अपने पिता का हाथ वह पकड़ लेती है और उनसे पुरोहित की सारी करतूत बताती है। सारी बात सुनकर उदयभान सिंह चौंक गया। आगबबूला उदयभान सिंह सैनिकों को आदेश देता है कि पुरोहित का नाक-कान-हाथ काटकर शहर से बाहर कर दिया जाये। उदयभान सिंह अपनी बेटी सोरठी को पूरे धूमधाम से, मान-सम्मान के साथ महल लिवा लाया। वह उनकी एकमात्र संतान थी और राज्य की उत्तराधिकारणी भी थी।

इधर दक्षिण में राजा टोडरमल सिंह की रानी को गोरखनाथ के आशीर्वाद से एक पुत्र प्राप्त होता है जिसका नाम बृजभार रखा जाता है। किशोर होने पर बृजभार की शादी राजा हांचल की पुत्री हेमन्ती से हुई। शादी के बाद बृजभार गुजरात अपने मामा खेंखरमल के यहां आशीर्वाद लेने पहुंचा, जिसे वह अपनी शादी में आमंत्रित नहीं कर पाया था। बृजभार को दूल्हे की पोशाक में देखकर कुष्ठ रोग का शिकार खेंखरमल उसे ताना देता है कि हमसे उम्र में छोटे होने पर भी तुम्हारा विवाह हो गया, जबकि मैं आजतक कुंवारा हूं। यह सुनकर बृजभार खेंखरमल की शादी के लिए राजकुमारी खोजने निकल पड़ता है।

राजकुमारियों को खोजते-खोजते बृजभार अमरपुर पहुंचता है जहां की तीन सौ राजकुमारियां अविवाहित थीं। अमरपुर में कोई भी पुरुष नहीं था क्योंकि उन राजकुमारियों ने सबको तंत्र-मंत्र के बल पर सुग्गा बनाकर रखा हुआ था। बृजभार के गठीले यौवन को देखकर सभी राजकुमारियां उस पर आसक्त हो गयीं और उससे शादी की जिद करने लगीं। बृजभार उनकी शादी का प्रस्ताव अस्वीकार कर देता है। गुस्से में राजकुमारियां उसे भी सुग्गा बना देती हैं। येन-केन-प्राकरेण बृजभार उनकी चंगुल से आजाद हो जाता है। वह राजकुमारियों को बंधक बनाकर गुजरात लाता है और अपने मामा से उनकी शादी कर देता है।

इधर राजा उदयभान सिंह ने जिस पुरोहित का नाक-कान-हाथ कटवा कर शहर निकाला दे दिया था, वह बृजभार के मामा खेंखरमल के पास पहुंचता है और सोरठी के रूप-लावण्य की खूब प्रशंसा करके कहता कि अगर उसका विवाह किसी तरह सोरठी से हो जाये, तो उसका कुष्ठ रोग ठीक हो जाएगा। यह वृतांत खेंखरमल बृजभार को सुनाता है और सोरठी से अपने विवाह की जिम्मेदारी उसे सौंपता है।

सारा वृतांत सुनकर बृजभार सोरठपुर के लिए रवाना होता है। सोरठपुर के रास्ते में रतनपुर, पकवा ईनार, हस्तिनापुर, हेवलपुर आदि जगहों पर बृजभार का पाला तंत्र-मंत्र से निपुण जादुगरनियों से  पड़ता है लेकिन वह सभी विघ्न बाधाओं पर पार पाता हुआ सोरठपुर पहुंच जाता है। सोरठपुर की सीमाओं पर राजा उदयभान सिंह के सैनिकों का कड़ा पहरा था। सैनिकों को आदेश था कि कोई भी युवक शहर की सीमा में प्रवेश नहीं कर पाये। बृजभार जादू से एक बूढ़ा का वेष धारण करके नगर में प्रवेश कर जाता है और अपने असली रूप मे आकर वह एक फुलवारी में आराम करने लगता है।   

यह बात सोरठी को पता चल जाती है। वह बृजभार से मिलने फुलवारी पहुंचती है और बृजभार सोरठी को अपने मामा का सारा वृतांत सुनाकर उनसे शादी का प्रस्ताव रखता है। सोरठी बृजभार के मामा कुष्ठरोगी खेंखरमल से विवाह के लिए तैयार हो जाती है और अपने साथ तंत्र-मंत्र में दक्ष एक मालिन को साथ लेकर बृजभार के साथ गुजरात के लिए निकल पड़ती है। सोरठी और मालिन के साथ बृजभार इंद्र के रथ पर सवार होकर गुजरात खेंखरमल के पास पहुंचता है। खेंखरमल जैसे ही सोरठी को देखता है, उसका कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है। खेंखरमल सोंरठी से दोगुने उम्र का था। लिहाजा, अपनी ढलती उम्र का हवाला देकर खेंखरमल बृजभार से कहता है कि सोरठी से विवाह उसे करना चाहिए।

मामा के कहने पर बृजभार सोरठी से विवाह कर लेता है और विवाह के पश्चात् बृजभार को अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर खेंखरमल तपस्वी का वेष धारण कर जंगल में तपस्या के लिए चला जाता है। इस तरह सोरठी और बृजभार सुखीपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगते हैं।

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