कालीघाट पेंटिंग: बंगाल की लोककला परंपरा

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Common representation of Kalighat painting, Bengal.
Common representation of Kalighat painting, Bengal.
भारत में परंपरागत रूप से कला राज्याश्रय या मठों-मंदिरों के संरक्षण में सदियों से फली-फूली। लेकिन वह बाजार में आयी कालीघाट से। इसे कला बाजार की शुरुआत माना जाता है।

सुमन सिंह । कला समीक्षक एवं वरिष्ठ पत्रकार, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कला लेखन, शोध-कार्यों एवं कला इतिहास में गहरी रुचि

उड़ीसा की तरह पूरे बंगाल में भी पट चित्रों की परंपरा देखी जाती है। कतिपय राजनीतिक-सामाजिक कारणों से यह परंपरा 19वीं सदी के उत्तरार्ध में कलकत्ता आकर कालीघाट पट चित्रण के नाम से मशहूर हुई। उस दौर में ब्रिाटिश साम्राज्य के तहत कलकत्ता एक राजनीतिक व व्यापारिक केंन्द्र के तौर पर उभर रहा था। लगभग उसी समय अंग्रेज भारतीय समाज में पैठ बनाने के मद्देनजर भारतीय साहित्य, संगीत एवं कला में रूचि लेने के साथ-साथ उसके संरक्षण के लिए भी आगे आए।

इस दौर में कलकत्ता के प्रसिद्ध काली मंदिर के आसपास बंगाल के लोककलाकारों ने आश्रय लेना शुरू कर दिया, विशेषकर 24 परगना और मिदनापुर के कलाकारों ने। उन्होंने काली मंदिर के आसपास अपनी दुकान लगानी शुरू कर दी क्योंकि वहां उन्हें आसानी से उनकी कलाकृतियों के खरीदार मिलने लगे।

विदित हो कि भारत में परंपरागत रूप से कला राज्याश्रय या मठों-मंदिरों के संरक्षण में सदियों से फली-फूली। लेकिन वह बाजार में आयी कालीघाट से। इसे कला बाजार की शुरुआत भी माना जाता है। परंपरागत पट चित्रों का आकार सामान्य तौर पर बड़ा होता था क्योंकि इसमें अक्सर किसी घटना या चरित्र की पूरी गाथा चित्रित की जाती थी। इन पट चित्रों का सामान्य आकार 20 फीट तक होता था जिन्हें रखना और सहेजना सहज नहीं होता था। उन चित्रों को स्थानीय बोलचाल में पट और उसके रचनाकारों को पटुआ कहा जाता था।

कतिपय इन्हीं कारणों से खरीददारों की प्राथमिकता बदलने लगी। अपेक्षाकृत छोटे आकार के चित्रों की मांग बढता देखकर इन कलाकारों ने कागज पर छोटे-छोटे चित्र बनाने शुरू कर दिये। इन चित्रों में अमूमन एक, दो आकृति हुआ करती थी और चित्रों की पृष्ठभूमि में अलंकरण या अनावश्यक विस्तार देने से बचा जाता था। इस तरह के चित्र कम समय में तैयार हो जाते थे। इसलिए ये चित्र अपेक्षाकृत सस्ते दामों पर खरीदार को मिल जाया करते थे। 

कालीघाट पेंटिंग के कालखंड को कुछ इतिहासकार तीन हिस्सों में मानते है। पहला, 1800 से 1850, जिसमें इस शैली ने अपनी पहचान गढ़ने की शुरूआत की। दूसरा, 1850 से 1890 जिसमें यह कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंची, जिसमें शैली के संयोजन और रंग-सज्जा, दोनों नजरिये से इस कला का विकास होता गया। किन्तु, 1900 से 1930 का समय वह दौर माना जाता है जब छापाखानों के प्रसार ने इन चित्रों की सस्ती प्रतिलिपियां ग्राहकों को उपलब्ध करानी शुरू कर दी।

यूं तो इस शैली के चित्र दुनिया भर के संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे हैं। किन्तु, लंदन स्थित विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम, जहां लगभग 645 चित्रों और रेखांकनों का संग्रह है, इन चित्रों का सबसे बड़ा संग्राहक माना जाता है। इसके अलावा ऑक्सफोर्ड, प्राग, पेनसिलवानिया और मास्को के संग्रहालयों में भी इस शैली के चित्र संग्रहित हैं।

भारत में विक्टोरिया मेमोरियल हॉल, कलकत्ता, इंडियन म्यूजियम, बिड़ला एकेडमी ऑफ आर्ट एंड कल्चर व कला भवन, शांतिनिकेतन समेत अनेक स्थानों पर इस शैली के संग्रहित चित्रों को देखा जा सकता है। इन चित्रों में प्रयुक्त होने वाली सामग्री की बात करें तो इसमें परंपरागत रंगों का प्रयोग किया जाता था। मसलन, पीला रंग के लिए हल्दी, नीला के लिए अपराजिता के फूल और काला के लिए दीये या ढिबरी से तैयार कालिख का। बाद के वर्षों में यहां भी बाजार में आसानी से उपलब्ध रासायनिक रंगों का प्रयोग किया जाने लगा। 

भारतीय पारंपरिक कला की इस शैली में विषयों का जितना विस्तार है, वह दूसरी शैलियों में शायद ही दिखता है। इन चित्रों के खरीदारों में एक बड़ा वर्ग मंदिर आने वाले हिन्दू धर्मावलंबी होते थे, इसलिए देवी देवताओं विशेषकर काली और गौरी के विभिन्न रूपों का चित्रांकन ज्यादा यहां पाया जाता है। उनके अलावा कार्तिकेय, गणेश, सरस्वती के चित्रांकन के साथ-साथ विष्णु के अन्य अवतारों सहित परशुराम, कृष्ण की बाललीला व पुतना वध और कालिया मर्दन जैसे प्रसंगों का अंकन भी इस शैली में किया गया है। यहां तक कि इस्लाम और ईसाइयत जैसे धार्मिक विषयों पर भी चित्रण की परंपरा यहां दिखती है। कर्बला के शहीद हुसैन के दुलदुल नामक घोड़े का चित्रण भी इस शैली में किया जाता रहा है। दैनिक लोकजीवन व समसामयिक घटनाओं का भी चित्रण काली घाट शैली में मिलता है।

1873 में घटित बंगाल का चर्चित तारकेश्वर हत्याकांड जिसमें मंदिर के महंथ और एलोकेशी के बीच प्रेम संबंधों की जानकारी होने पर महिला के पति नवीन चंद्र द्वारा पत्नी की हत्या कर दी गई थी, इस घटना का भी विस्तार से चित्रण इस शैली में किया गया। उस दौर में इस चित्रमाला या चित्रकथा की बाजार में काफी मांग थी। 1890 के आसपास सर्कस में बाघों से लड़ने का करतब दिखाने वाले श्यामकांत बनर्जी को भी इस चित्रमाला में जगह दी गई। यानि, देखा जाए तो यह कला शैली अपने को बाजार के मांग के अनुकूल विषयवस्तु को अपनाती रही। 

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