“समय के साथ बदलेगी मंजूषा कला, लेकिन शैलीगत छेड़छाड़ से बचें”

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डॉ. अमरेंद्र, भागलपुर, बिहार। अंगिका के जाने-माने साहित्यकार।
डॉ. अमरेंद्र, भागलपुर, बिहार। अंगिका के जाने-माने साहित्यकार।
"जो गतिशीलता का विरोधी है, परिवर्त्तन का विरोधी है, वह मृत्यु का पक्षधर है, जड़ता का समर्थक है। परिवर्त्तन चाहे जितना हो, उसे देखते ही लगना चाहिए कि यह मंजूषा शैली ही है।"

बिहार के अंग-क्षेत्र में प्रचलित लोकगाथा बिहुला विषहरी पर आधारित परंपारिक लोककला मंजूषा इन दिनों अनेक बदलावों और प्रयोगों के दौर से गुजर रही है। लेकिन, उन बदलावों का स्वरूप क्या हो, उस पर विवाद रहा है। यह विवाद स्वाभाविक ही है क्योंकि इसमें लोकगाथा अपने अनेक विषयों में मुख्य रूप से दो का सीधे-सीधे प्रकटीकरण करती है। पहला, प्रकृति के साथ मानवजाति का सहअस्तित्सव और दूसरा नारी सशक्तिकरण। लोकगाथा के माध्यम से ये विषय कागज पर उतरकर मंजूषा कला का रूप लेते है। इसके अपने रूपाकार हैं, अपना रंग विन्यास है और अर्थ हैं। इन तमाम विषयों को समेटता है अंगिका के ख्यातिलब्ध साहित्यकार डॉ. अमरेंद्र का यह साक्षात्कार, जिसे मूर्त रूप दिया है वरिष्ठ लेखक और साहित्यकार चंद्रप्रकाश जगप्रिय ने। उन्होंने इस साक्षात्कार की शुरुआत की है ‘गोपनिया रंग’ विवाद से, जो मंजूषा कला में प्रयुक्त रंगों की अवधारणा से जुड़ा है। आप सबके समक्ष प्रस्तुत है वह विस्तृत साक्षात्कार : –     

जगप्रिय: मंजूषा कला में प्रयुक्त रंगों को लेकर आजकल बहसें हो रही हैं, मेरा संकेत गोपनिया रंग की ओर है। इस संबंध में आप क्या विचार रखते हैं?

डॉ. अमरेंद्र: देखिये, आप जिस ‘गोपनिया’ वाली बात को बता रहे हैं, उसमें तथ्य से अधिक कल्पना और अनुमान का योग है। जब हम किसी पद या पद्य का गोपनीय अर्थ निकालते हैं, तो उसमें एक तारतम्यता होती है। ठीक है कि गोपनीय में आए अक्षर क्रमानुसार गुलाबी, पीला, नीला का बोध कराता है, तो फिर ‘या’ किसका बोध कराता है। अगर आप कहेंगे कि ‘या’ यूं ही आ गया है तो यह बेकार होगा। अंग्रेजी का न्यूज शब्द बना है तो इसमें नॉर्थ, इस्ट, वेस्ट, साउथ है, सभी अक्षर सार्थक हैं। ऐसा भी नहीं है कि ‘या’ हरा का बोधक है। वर्णलोप या परिवर्त्तन की भी गुंजाइश नहीं दिखती है। ऐसे में गोपनीय का अर्थ सिर्फ यही है, मंजूषा में प्रयुक्त तीनों रंगों के अर्थ की गोपनीयता। इसमें पीला और गुलाबी यानी लाल तो सीधे इस गोपनीयता की ओर संकेत है कि बिहुला के हाथ पीले हुए थे, लाल सिंदूर से मांग लाल हुई थी, यानी गुलाबी और पीला रंग नागदंश के कुछ पल पूर्व के उत्साह-उमंग के अर्थद्योतक हैं। हरा का अर्थ और भी गोपनीय है, व्यापक है। हरा विषदंश का भी प्रतीक है और वंश वृद्धि का भी। विवाह के समय विभिन्न संस्कार कार्यों में एक यह भी है कि दुल्हिन के खोंचे में हरे बांस की पत्तियां और हरी दूब रखी जाती है। बांस और हरी दुबड़ियां वंश वृद्धि के प्रतीक हैं। जब मंजूषा कला में हरा रंग का प्रयोग होता है, तो इसका गोपनीय अर्थ यही प्रकट होता है कि विष-प्रभाव से बाला की मृत्यु नहीं हो सकती, वह जीवन प्राप्त करेगा और बिहुला-बाला का वंश फलेगा। बिहुला के इसी आत्मविश्वास और सर्प दंश की घटना को उजागर करता है मंजूषा का हरा रंग। गोपनीय का अर्थ छिपाने लायक होता है, गोपनीया शिष्ट ‘गोपनीय’ का लोक रूप है। गोपनीय का एक अल्प ज्ञात अर्थ रक्षणीय भी है। अर्थात् मंजूषा में जिन पारंपरिक रंगों का प्रयोग होता है, उसकी रक्षा हो, वह इस ओर भी संकेत करता हो। शायद इस लोकगाथा के कवि ने भविष्य में होने वाले गड़बड़ी को पहले ही समझ कर इस अर्थ में भी गोपनीय शब्द का प्रयोग किया हो। कहीं-कहीं मैंने बैंगनी रंग का प्रयोग अवश्य देखा है, लेकिन नीला का नहीं। आखिर बाजार के चक्कर में हम किस हद तक लोककला की हत्या करेंगे और बाजार तो चटक रंगों के संयोग से चलते हैं। अगर गोपनिया में नीला, बैंगनी रंग की ओर संकेत करता है, तो आपत्ति क्या है?

सर्प क्रोध की इस अमर लोकगाथा का महाभाव क्या हो सकता है?

आखिर विषहरी को धरती पर पूजा लेने की जरूरत क्यों आ पड़ी? इसका कारण तो साफ है कि जिसकी पूजा होती है उसका अहित व्यक्ति अपने सपने में भी नहीं सोचता है। आराध्य का अहित कैसे संभव है। कथा के प्रसंग से ही जुड़कर देखें, तो विषहरी शिव की बेटियां हैं, फिर भी पूजा लेने की जरूरत पड़ती है। इसका अर्थ है कि सर्पों के प्रति तब भी समाज का व्यवहार मानवीय नहीं होगा, जो चांदो की प्रोक्ति से भी उजागर होता है।

मनुष्य के इस व्यवहार से विषहरियों (सर्प जाति) का भड़क उठना स्वाभाविक है, जो बिहुला, लोकगाथा से लक्षित है। चांदो सौदागर के सभी पुत्र एक-एक कर विषहरी के क्रोध के शिकार हो जाते हैं। यहां यह बहुत विवेचनीय है कि चांदों के पुत्रों को पुनर्जीवन विषहरी की ही दया या किसी चमत्कारी शक्ति के कारण नहीं होती, वह तो होता है बिहुला की अदम्य, अदभुत संकल्प और उसकी अदभुत बुद्धिमत्ता पर। फिर भी, विषहरी को धरती पर अपने श्वसुर चांदों से बिहुला पूजा दिलवाती है। आखिर वह ऐसा क्यों करती है? जबकि विषहरी को भी इसका तो ज्ञान हो ही गया होगा कि बिहुला की शक्ति और संकल्प को मात देना कठिन है। सर्प के क्रोध से कहीं ज्यादा भारी है, बिहुला।

इसके पीछे कारण क्या हो सकता है? इस प्रश्न ने मुझे भी सोचने के लिए बार-बार विवश किया है और मुझे यही लगा कि इस लोकगाथाकार ने भी अवश्य यह समझा होगा कि आने वाले समय में मनुष्य, प्रकृति के इस जीव के प्रति असंवेदनशील हो जाएगा कि इसकी वह संवेदनहीनता, खाण्डव वन के सर्पों की तरह, पूरी पृथ्वी से सर्पों को हटा देगा। इसी से इसको पूजा दिलाना आवश्यक हो गया था, ताकि मनुष्य के भय, भ्रम और घृणा के कारण लुप्त हो रही प्रकृति की इस संतान की रक्षा संभव हो सके। बाला विषहरी की कथा का यह अप्रत्यक्ष महाभाव नौंवी-दशमी सदी में रचित इस लोकगाथा को आधुनिक चिन्ता से जोड़ देता है।

मंजूषा कला में सर्पों से रूप और स्थान में अन्तर मिलता है। क्या इसके पीछे कोई कारण है?

मंजूषा की सर्प कला अपनी व्यंजना को लेकर सर्वाधिक प्रमुख है। अपनी दार्शनिक अभिव्यक्ति में पंचमुख का सर्प भले ही पंचभौतिक शरीर की ओर भी संकेत करे, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से यह पांच बहिन विषहरी का ही प्रतीक है और इसी रूप में पांच सर्पों की संयुक्त आकृति को उभारने का प्रयास होता है। इसी तरह जहां मानवाकृति के रूप में पांचों बहिन को चित्रित किया जाता है, वहां पांचों के पांवों के नीचे सर्प की आकृतियां भी खींची जाती हैं जो उन देवियों के विषहरी होने का संकेत देती हैं।

यही सर्प-आकृति जब लंबे या समकोण रूप में किसी पुरूष के पांव के नीचे खींची जाती है तो वह सर्प, विषहरी का प्रतीक नहीं, नाग का प्रतीक होता है। चूंकि मंजूषा कला में आकृतियां प्राय: मिलती- जुलती हैं, इसी वजह से उन्हें विशेष प्रतीक चिन्हों से अलगाया जाता है। इसमें सर्प का विशेष महत्व है और उसमें भी उसके स्थान और स्थिति से। अगर सर्प किसी पात्र के सर पर छत्र की तरह या किसी पात्र की दृष्टि से विपरीत दिशा में फन किये हो तो उसका भी विशेष अर्थ है। एक में सखा भाव का चित्रण होता है, दूसरे में दास्य भाव का और पंचमुखी खड़ा सर्प विषहरी के दर्प का प्रतीक है।

तो क्या गाथा के प्रत्येक पात्र की अपनी कुछ-न-कुछ पहचान है?

हां, कुछ तो एकदम स्पष्ट और कुछ के बारे में हम लोकगाथा के ठीक से अध्ययन करने के बाद ही जान सकते हैं। और एक बात, कभी-कभी पात्र की पहचान के लिए जो विशेष कलम देखी जाती है, वह काफी भावात्मक भी है और विषय को बहुत स्पष्ट करने वाली भी। मंजूषा में झाड़ फूंक करने वाला झारखंडी का चित्र उन्हीं में से एक है। तंत्र-मंत्र को स्पष्ट करने के लिए ओझा के शरीर को कमर से नीचे धुआं रूप में उभारा जाता है, वह कला विशिष्टता और गंभीरता को जाहिर करता है।

Manjusha painting, Photo credit: http://www.manjushakala.in/wp-content/uploads/2015/10/19.jpg

कुछ इतिहासकार बिहुला लोकगाथा में आये स्थलों को भारत के विभिन्न अंचलों से जोड़ते हैं, उजानी वाला प्रसंग भी उन्हीं में से एक है?

भयभीत सदा भय को देता, भय की उपासना में विलीन। इससे अधिक मैं कुछ भी नहीं कहना चाहूंगा। बहुत पहले की बात है जब मैंने इस गाथा में आए उजानी स्थल को अंगप्रदेश के नौगछिया अंचल के एक क्षेत्र को बताया था। इतिहासकार ज्योतिष चंद्र शर्मा ने इस तथ्य को गलत बताया था। यह एक दशक पूर्व की बात है। इससे मेरे विचार में कोई फर्क नहीं आया। फिर एक दिन हिन्दुस्तान (भागलपुर, 15 मार्च 2008) में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई, ‘विकास से कोसों दूर है सती बिहुला की जन्मभूमि उजानी’ और उस स्थल को ज्योतिष चंद्र शर्मा ने भी मेरे साथ जाकर देखा था। साथ में थे – केशव, मनोज पंडित और एक व्यक्ति। पता नहीं, अब भी शर्मा जी की धारणा पहले वाली ही है या बदली भी। वैसे इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। बिहुला नदी मार्ग से इंद्रलोक तक पहुंची थी, बैलगाड़ी या डोली से नहीं, न रथ पर, न हाथी से। यह सब होता तो उजानी को उज्जैन मानने का भ्रम भी उठता। कुछ मनीषी यह भी बताते मिल जाते हैं कि मृत बाला की देह इतनी जल्दी गल कैसे सकती है, अगर चंपा से बंगाल की खाड़ी तक पहुंचना हो।

ऐसे मनीषियों को शायद यह नहीं मालूम कि बिहुला के मंजूषा को प्रवाह मार्ग में कितनी-कितनी बार रूकना पड़ा था। फिर अवश्य ही ऐसा कोई गलतन्त्री घाट होगा, जहां की जलवायु तब ऐसी भी रही होगी, जो जीवित देह को भी गलाने की ताकत रखती हो, मृत बाला की बात तो अलग है। यहां मैं उस त्रिमुहानी की भी बात करना चाहूंगा जिसे गाने वाले कभी-कभी त्रिवेणी भी गाते मिल जाते हैं। त्रिमुहानी गंगा का वह क्षेत्र है जहां से गंगा सचमुच में सागर बनने लगती है। कोसी से मिला गंगा का विशाल क्षेत्र ‘गंगाहद’ कहलाता है, जिसके महान तीर्थस्थल होने की बातें पुराण भी करते हैं। मुझे लगता है कि यही गंगाहद यानी कुरसेला से राजमहल तक का गंगा-क्षेत्र, इन्द्र का इन्द्रलोक ही रहा हो, तो कोई आश्चर्य नहीं। हवलदार त्रिपाठी सहृदय ने ‘बिहार की नदियां’ में इसका उल्लेख किया है कि ‘गंगाहद’ इन्द्राणी तीर्थ था। इसी स्थल पर इन्द्र की पत्नी शची ने घोर तपस्या करके, इन्द्र को पति रूप में प्राप्त किया था। नारदीय महापुराण की यह मान्यता बिहुला गाथा के अनसुलझे प्रश्न को सुलझाने में सहायक है।

लोकगाथा में आये आश्चर्यजनक घटनाओं के संबंध में आप क्या कहेंगे?

मैं आपकी बातों को समझ रहा हूं। लोकगाथा में अगर ऐसी घटनाएं उपस्थित है, तो वे आपको परेशान क्यों करती हैं। आज भी आपको ऐसे कुछ तांत्रिक-जादूगर मिल जा सकते हैं, जो आपके हाथों पर रसगुल्लों का झोला गिरा देंगे, उड़ते कबूतर को फड़फड़ा कर गिरते दिखा देंगे, फिर उड़ा भी देंगे। अंग्रप्रदेश तांत्रिकों का विश्वविख्यात सिद्ध क्षेत्र रहा है। कुछ बातें आपको उलझन में डाले, तो समझिये कि पी.सी. सरकार का जादू तब भी विद्यमान था। वैसे मैं एक बात कह दूं कि आश्चर्य और इनकार वही करता है, ज्ञान जिसके पल्ले नहीं पड़ता, या उसके बारे में उसको पैसे भर का भी ज्ञान नहीं है। बिहुला लोकगाथा में जो आश्चर्यजनक घटनाएं हैं, उन पर कल्पना का एक हल्का रंग भी है, जो कथा को चटकीला बनाए रखने के लिए जरूरी रहा होगा। बिहुला लोकगाथा की सारी घटनाएं, पात्र, स्थल, क्रियाएं, अंगप्रदेश के प्राचीन सांस्कृतिक वैभव की कलात्मक अभिव्यक्ति हैं, हमें भूलना नहीं चाहिए। जब कभी मैं शिव के पांच केशों से पांच कमल फूलों और कमल फूलों से पंच कन्याओं के जन्म की कथा सुनता हूं, तो मुझे अंग के उस काल का स्मरण हो आता है जब ‘पुरैन’ के कारण अंग का उत्तरी हिस्सा पूर्णिया कहलाया था। चंपा की झीलों में कमलों का वन था जिसके दलों पर अदभुत कलाओं का प्रदर्शन होता था। डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव ने भी ‘वासुदेव हिण्डी’ में आए इस प्रसंग का उल्लेख अपने लेख में किया है। जगप्रिय जी, कभी-कभी कोई घटना भौतिक शरीर को छोड़ते हुए इतनी व्यापक बन जाती है कि उसका वही रूप स्पृहणीय बन जाता है। वैसे भी जीन अन्वेषण और प्रत्यारोपण की क्रिया अगर अंगदेश में तब भी रही हो, तो कमल से कन्या का जन्म क्या आश्चर्यजनक है?

मंजूषा कला को क्यों बचाए रखना जरूरी लगता है?

ताकि स्त्री-जाति के असीम साहस, विपरीत परिस्थितियों के विरूद्ध हिमालय की तरह खड़े रहने का उसका हौसला, आधुनिक औरतों का संबल बन जाए, ताकि समाज में एक वर्णहीन चेतना के विकास में आज का लोकमानस अग्रसित हो सके, ताकि धार्मिक अहंकार की अन्तहीन यातनाओं को समाज समझे, ताकि चंपा के गौरवमय वाणिज्य का इतिहास अलिखित-लिखित पाठ की तरह जन-जन में कायम रहे, ताकि अंगप्रदेश फिर से यह विचार कर सके कि विश्व को सोने की चमक देने वाला अंग देश आज सिकुड़ कर स्याह क्यों पड़ गया है।  

विश्वास कीजिए, मुझे मंजूषा कला एक क्षुद्र छित्र की मंजूषा नहीं, सैंकड़ों खिड़कियों की स्वर्ण-मंजूषा दिखाई देती है, जिनसे प्रेरणाओं की असंख्य रश्मियां ऊपर उठती रहती हैं। जैसे – मंजूषा कई दिव्य दीप्त नक्षत्रों का कुम्भ हो। आपको क्या बताऊं, अपने घर की दीवार पर पड़ी मंजूषा कला को जब कभी मैं देखता हूं, तो सोचने लगता हूं कि बिहुला जब मंजूषा में बैठकर गंगा मार्ग से आगे बढ़ी होगी, तब कैसी होगी वह विशाल गंगा, आखिर क्यों सूख गई वह गंगा? जगप्रिय जी, मंजूषा कला को संरक्षित कर हम ढेरों समस्याओं के निदान के प्रति सजग हो सकते हैं। यह कला सिर्फ कला नहीं है, अंगप्रदेश का सामाजिक-धार्मिक इतिहास भी है। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि कालक्रम में शैव का भी एक और भाग हो गया होगा, नागपंथ और दोनों के बीच श्रेष्ठता को लेकर इस अंगप्रेदश में वैमनस्य का भयावह संघर्ष छिड़ गया हो, जो नागवंश स्त्री-सत्ता के महत्व पर आधारित होगा। वैसे भी अंगप्रदेश स्त्री-सत्ता का प्रदेश रहा है, जब यह महाजनपद पितृसत्तात्मक बन रहा होगा, तब स्त्री-सत्ता का यह क्षेत्र चुप नहीं रहा होगा। मैंने जब कभी मंजूषा कला पर सोचा है, तब-तब मुझे यह भी लगा है कि चंपा के चन्द्रधर सौदागर की ऐतिहासिक घटना के साथ कुछ अन्य घटनाएं भी कालक्रम में जुट गयी होंगी, जिससे इस लोकगाथा का स्वरूप कुछ-कुछ मिथकीय हो गया है।

मंजूषा कला का जो रूप है, इसमें कुछ बदलाव देखे जा रहे हैं। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

जो गतिशीलता का विरोधी है, परिवर्त्तन का विरोधी है, वह मृत्यु का पक्षधर है, जड़ता का समर्थक है। आज जो मंजूषा का रूप है, क्या आप समझते हैं कि वही रूप आज से सौ वर्ष पूर्व भी रहा है या हजारों वर्ष पूर्व भी। एकदम नहीं। लहसन माली ने जब पहली बार मंजूषा पर चित्रों को उभारा होगा, तो विषय बेशक वही होंगे जो आज भी हैं, लेकिन चित्र हू-ब-हू ऐसे ही रहे होंगे, मुझे ऐसा मानने में संकोच होता है। वैसे मेरी बातों से यह समझ लेना कि शताब्दियों पूर्व और आज के मंजूषा चित्रों में 36 का संबंध बन गया है, गलत होगा। जब कोई कला एक रूप धारण करती है, तब उसमें परिवर्त्तन की गति बड़ी बारीक होती है, जिसे आसानी से नहीं समझा जा सकता है। लेकिन, कला पर युग और कलाकार के दिलो-दिमाग का प्रभाव भी पड़े बिना नहीं रह सकता। उसकी रुचि का भी प्रभाव कला पर पड़ता है, स्थान विशेष का भी। एक कला जब एक जगह से दूसरी जगह पहुंचती है, तब उसका रूप वही नहीं रह जाता, स्थान और स्थान विशेष के कलाकार की रुचि का प्रभाव उस पर पड़ता ही है। मैंने दशकों पूर्व मंजूषा कला पर एक पुस्तक देखी थी। अगर मैं भूला नहीं हूं तो उस पुस्तक की लेखिका और चित्रकार का नाम सुखलता है। पुस्तक की भूमिका कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखी है। लेखिका सुखलता ने जो चित्र बनाए हैं, वे ऐसे चित्र नहीं है जो अंगप्रदेश में बनाये जाते हैं। अंगप्रदेश में बनाये जाने वाले मंजूषा चित्र सही मायने में लोककला के उदाहरण हैं और सुखलता के वे बनाये चित्र शिष्ट कला के उदाहरण हैं, जिन्हें लोककला की कोटि में तो कदापि नहीं रखा जा सकता। दोनों कलाओं में यह भिन्नता, दोनों की उम्र को भी प्रकट करती है। लोककला आदिम है और शिष्टकला नगर-संस्कृति से पोषित अभिजात्य कला। जब कलाओं के बीच इतनी दूरी बन जाए तो दोनों को एक बताने का विवेक भी फिजूल लगता है। मैंने कहा न, लोककला में परिवर्त्तन की गति इतनी महीन होती है कि उसमें हजारों वर्ष से आ रहे बदलाव के बावजूद उसें बदलाव नहीं दिखता। मैंने नाबार्ड और दिशा की ओर से 20 मई 2010 को आयोजित त्रि-दिवसीय कार्यशाला में यह देखा कि वहां लड़कियों ने जिस तरह से चित्र बनाये थे, वे वैसे नहीं थे जैसा चक्रवर्ती देवी के बनाए मिलते हैं। फिर भी उन चित्रों को देखकर आप कह उठेंगे कि वह मंजूषा कला है। बस परिवर्त्तन चाहे जितना हो, उसे देखते ही यह लगना चाहिए कि यह और कुछ नहीं, मंजूषा शैली ही है।

क्या आपको ऐसा लगता है कि मंजूषा कला में विशेष संदर्भों के चित्रों की ही प्रमुखता है?

यह है और ऐसा है तो हमारे नये कलाकारों को उन संदर्भों के बारे में ज्ञान नहीं है जो उन्हें नया गढ़ने के लिए प्रेरित करे। मंजूषा कला लोकगाथा पर आधारित कला चित्रों की कला है और इस अर्थ में यह कला लोककला की दुनिया में अपनी अलग विशिष्ट पहचान रखती है। मेरी इच्छा है कि हमारे नये कलाकर बिहुला लोकगाथा को संपूर्ण रूप से सुनें, पढ़ें, तभी उनकी कला में नवीनता भी आयेगी, ठहराव टूटेगा। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि बिहुला लोकगाथा में कहीं-कहीं तो चित्रों के गढ़ने का पूरा-पूरा संकेत लिखित है। मैं गाथा के उस प्रसंग को कहना चाहूंगा जहां नाग बाला को डंसने से इनकार करता है। बाला का वहां जो रूप वर्णन नाग के द्वारा किया जाता है, वह कलाकार के मुश्किलों को सहजता से हल करता है।

मंजूषा में सर्पकला की प्रमुखता पर आप कुछ और कहना चाहेंगे?

देखिये, मैं आपको बिहुला विषहरी लोकगाथा की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं – (अमरेंद्र जी गाते हैं)

होरे केश तोरों देखौं रे बाला लोर जे ढरिय रे
होरे कौनी अंगे डंसौ रे बाला माया लागी जाय माया
होरे सिर तोरों देखौं रे बाला नारियल फोल रे
होरे भौंआ तोरों देखौं रे बाला चढ़ल कमान माया
होरे दांत तोरों देखौं रे बाला बिजुली चमक रे
होरे मोंछ तोरों देखौं रे बाला भौरा के गुंजान माया
होरे गल्ला तोरों देखौं रे बाला सोबरन कलश रे
होरे सीना तोरों देखौं रे माया मयनी के पात माया
होरे आठो अंग देखौं रे बाला अगर चन्दन रे
होरे बिनु अपराध हे माता हम्में नै डसबै माया

लोकगाथा में यह मणियार नाग की उक्ति है कि बिना अपराध मैं बाला को नहीं डंस सकता। अपराध करने पर तो आदमी भी आदमी को नहीं छोड़ता, सांप तो मानवेतर जीव है, फिर भी यहां आदमी से ज्यादा संवेदनशील है। मंजूषा कला का विनाश होगा तो आदमी का भी विनाश होगा। सांप के प्रति हमने जो गलत धारणा बना रखी है, उसे त्यागने में ही मानव जाति की भलाई है, नहीं तो इस भय के कारण एक दिन मनुष्य धरती पर से सांप की सारी प्रजातियों को ही उठा देगा। मुझे याद है, भागलपुर से प्रकाशित एक अखबार में एक रिपोर्ट छपी थी। पेरिस में अनुसंधानकर्त्ताओं ने विस्तृत अध्ययन के बाद यह बताया कि विश्व भर में प्रमुख प्रजातियों के सांपों का लोप हो चुका है। अनुसंधानकर्त्तओं के ही अनुसार 1990 के दशक में चार वर्षों की अवधि में फ्रांस, इटली, ब्रिटेन, नाइजीरिया जैसे देशों में 17 में से 11 प्रजातियों के सर्पों में कमी आ गयी थी। यह भयावह स्थिति है और ऐसा भी हो सकता है कि एक दिन सर्प कहानियों में रह जाएं। बढ़ते शहर, घटते जंगल, सर्प-चर्म का व्यापार, सर्प जाति को समूल नष्ट करने पर हम तुले हुए हैं। ऐसे में मजूषा कला के माध्यम से हम समाज में इस विवेक को प्रचलित कर सकते हैं कि सांप मनुष्य का दुश्मन नहीं, वह साथी है।

जब मंजूषा कला का विकास होगा, तब आमलोगों में सांपों के बारे में जानने की जिज्ञासा बढ़ेगी, तब वह यह भी जान पायेंगे कि सभी सांपों में विष होता भी नहीं। विष का प्रहार विषम स्थिति में ही सांप करता है और उस स्थिति में इलाज भी सांप के विष से ही होता है। सांप विषकारक है और विषहरण भी है। जब हम पांचों बहन में बड़ी बहन विषहरी के दायें हाथ में अमृत कुंभ रखते हैं तो इसका अर्थ स्वयं प्रकट हो जाता है। अंग्रप्रदेश में विषहरा या विषहरी की पूजा का महाभाव मंजूषा कला के बीच ही प्रकट है।   

References:
चंद्रप्रकाश जगप्रिय, 2011 “अंगप्रदेश की लोककला मंजूषा“, प्रकाशक: एम.आर. प्रिंटर्स , नई दिल्ली. “मंजूषा बचेगी तो पर्यावरण भी बच जाएगा ” , पृ. 32.

Other links:
Manjusha Art, Bhagalpur: An Introduction
Manjusha Art of Bhagalpur, Bihar: A Brief History
मंजूषा कला: अंग म
हाजनपद की लोककला
चक्रवर्ती देवी से मिली मंजूषा चित्रों
को पहचान
Bihula-Bisahari: Folklore of Anga Regi
on

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