मंजूषा कला: अंग महाजनपद की लोककला

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Traditional Manjusha painting, Artist: Manoj Pandit, Bhagalpur, Bihar
Traditional Manjusha painting, Artist: Manoj Pandit, Bhagalpur, Bihar
मंजूषा कला की खोज 1941 में आई.सी.एस. अधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्चर ने की थी। उन्होंने अंग के माली परिवारों द्वारा बनाये मंजूषा चित्रों को लंदन के इंडिया हाउस में प्रस्तुत किया था।

डा. अमरेन्द्र I पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, बौंसी, बांका I अंगिका के जाने-माने साहित्यकार I काव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, आलोचना की विधाओं में 50 से ज्यादा पुस्तकों का सृजन I

‘संस्कृति के चार अध्याय’ में रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि हिन्द-चीन में समुद्र के किनारे चम्पा राज्य की स्थापना द्वितीय शती में हुई। यहां भी राज्य का चम्पा नाम इसलिए प्रचलित हुआ कि राज्य स्थापित करने वाले हिन्दू चम्पा, भागलपुर से आए थे। इन सभी द्वीपों का नाम अंगद्वीप था।

‘चम्पा’ अंग देश की राजधानी थी, जिस अंग की स्थापना बली के पुत्र ‘अंग’ ने अपने नाम पर की थी। अंग के इसी चक्रवर्ती राजा ने समस्त पृथ्वी को जीत कर अश्वमेघ यज्ञ किया था (ऐतरेय ब्राह्मण- 39\8\21)। चम्पा, यानी मौर्य सम्राट् अशोक की मां शुभद्रांगी की चम्पा, जैनियों के बारहवें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य के जन्म और निर्माण की चम्पा, महाजनक नामक महानाविक की चम्पा। इसी चम्पा में छठी शती के आसपास चन्द्रधर नाम का एक प्रसिद्ध सौदागर था। बाला लखिन्द्र उसी सौदागर का पुत्र था और बिहुला बाला लखिन्द्र की पत्नी, जिन्हें मनसा बहनों के क्रोध का शिकार होना पड़ा था, क्योंकि मनसा विषहरी के बहुत चाहने के बावजूद शिव के अनन्य भक्त चंद्रधर उसे पूजा देने से इनकार कर गया था। कथा है- शिव की मानस बेटियां (विषहरी, मैना, दिति, जया और पद्मा) यह देखकर अत्यन्त जलभुन उठीं कि धरती पर शिव-पार्वती से लेकर गणेश, कार्तिकेय तक की पूजा तो होती है, लेकिन मनसा (मानस पुत्रियों) की नहीं। दु:खित हो मनसा ने यह व्यथा कथा जब शिव से सुनाई तो उन्होंने कहा- अगर धरती पर चम्पा देश का चन्द्रधर सौदागर उन्हें पूजा दे दे, तो मनसा धरती पर पूजनीय हो जाएंगी। फिर क्या था, मनसा बहनें सौदागर के पास पुहंची। आने का उद्देश्य बताया, लेकिन चन्द्रधर तो शिव के अतिरिक्त किसी को भी पूजा देने के लिए तैयार नहीं था। क्रोधित मनसा बदला लेने की भावना से भर गई और दंडित करने के ख्याल से मनसा ने चन्द्रधर के उन वोहितों (जहाजों) को समुद्र में डुबो दिया, जो व्यापार के लिए निकले थे। उन वोहितों के डूबने के साथ, चंद्रघर के छह बेटे भी डूब कर मर गए। लेकिन, तब भी चन्द्रधर सौदागर मनसा को पूजा देने के लिए तैयार न हुआ। सातवें बेटे लखिन्द्र की शादी बिहुला से हई। भय था कि विवाह की रात ही लखिन्द्र की मृत्यु सांप के डसने से हो जाएगी। इसी से सुरक्षा की जितनी भी व्यवस्थाएं हो सकती थीं, की गईं। लोहे का घर बनाया गया, लेकिन सूत की मोटाई भर छेद छूट जाने के कारण नाग का प्रवेश उस लौह गृह में हो गया और लखिन्द्र को नाग ने डंस लिया। चम्पा के महान धनोत्तर गुरु और केशो झारखण्डी के हजार उपचार के बाद भी लखिन्द्र नहीं बच पाता और बिहुला विधवा हो गई। चन्द्रधर सौदागर तब भी मनसा के सामने नहीं झुकता। वह लखिन्द्र को गंगा में प्रवाहित कर देने का आदेश देता है, लेकिन बिहुला ऐसा नहीं होने देती है। उसके आग्रह पर कई मंजिलों वाली विशाल नौका बनवाई जाती है। ऐसी नौका बनाते हैं, देवताओं के कर्मकार भगवान विश्वकर्मा।

अंगप्रदेश की अतिप्रसिद्ध लोककला मंजूषा, कई मंजिलों वाली नाव पर विशेष कर टिकी है। यह नाव कुछ इस तरह से बनाई गई थीं, जैसे किसी भव्य महल का लघु रूप हो। इस मंजूषा में वे सारी प्रमुख चीजें रखी गई थीं, जो बाला और बिहुला के जीवन से जुड़ी थीं। मंजूषा की दीवारों पर लहसन माली ने उन चित्रों को कलात्मकता के साथ उभारा था, जो बाला-बिहुला के जीवन से जुड़ी घटनाओं को व्यंजित करते थे। यह बात आज से पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व की है, (या इससे भी पूर्व की) जिसे आज भी अंगदेश में मंजूषा कला के नाम से जाना जाता है। दिन होता है 16 और 17 अगस्त (सावन या भाद्र मस का सिंह नक्षत्र), क्योंकि इसी दिन दुर्भेद्य लौहगृह में प्रवेश कर नाग ने लिखन्द्र का दंशन किया था।

लोकविश्वास यह भी है कि अंगप्रदेश में आज जिस रूप में मंजूषा निर्मित होता है, वह वैसा ही है, जैसा विश्वकर्मा ने बनाया था। प्रत्येक वर्ष, सिंह नक्षत्र के प्रवेश के पन्द्रह बीस रोज पूर्व से ही मंजूषा का निर्माण प्रारम्भ हो जाता है, जो स्थापत्य और लोकचित्रकला की दृष्टि से अद्भुत होता है। मंजूषा-कला कागज की भित्ति से बने मंजूषा पर रची गई विशिष्ट चित्रशैली है, जो सनई की लकड़ी और शोला से खड़ी होती है। मंजूषा को चतुष्कोणीय संरचना पर ही खड़ा किया जाता है, लेकिन विशिष्ट प्रकार से बनाई गई मंजूषा की संरचना भी भिन्न होती है। इस प्रकार की मंजूषा षट्कोणीय होती है और चार खूंटे की जगह, भार के अनुकूल आठ खूंटे (पद) पर खड़ी होती है। विशेष प्रकार की मंजूषा पर कई कंगूरे का भी निर्माण बड़ी कलात्मकता के साथ किया जाता है। मंजूषा सामान्य हो या विशिष्ट, इसकी भित्तियों पर बाला-विषहरी की कथा से जुड़े विविध प्रसंगों और पात्रों को परम्परागत रंगों से उभारा जाता है, जिनमें चम्पा नगरी के चम्पक पुष्प और पत्ते के अतिरिक्त नाग, पांच बहन विषहरी, चंद्रधर सौदागर, बाला लखिन्द्र, गंगा का प्रतीक मगरमच्छ, चांद, सूरज आदि प्रमुख होते हैं। इन चित्रों में जहां बिहुला को दर्शाने के लिए उसके खुले केश और समीप ही नाग को बनाया जाता है, वहीं पांचों बहन विषहरी की भिन्नता के लिए उनके हाथों में विभिन्न प्रतीक के चिन्ह दिए जाते हैं। सच पूछिए तो यह मंजूषा कला प्रकारान्तर से प्रतीक कला ही है, जो मुख्य रूप से नीले, पीले, गुलाबी रंगों के सहारे उभारी जाती है।

मंजूषा कला में चम्पा वृक्ष की पत्तियों और सर्पों से बनी जंजीर के बार्डर प्रमुख स्थान रखते हैं। अंग्रेजी के ‘S’ वर्ण के आकार में रेखाएं इस तरह गुंथी रहती हैं कि ये सामान्य जंजीर का भले बोध करती हों, लेकिन वास्तव में ये रेखाएं सर्पों को ही जोड़ कर बनाई गई जंजीर हैं। कूची के रखने के साथ ही सर्प के फण स्वाभाविक रूप से खड़ा हो जाता है। इसकी ओर विद्वानों का कम ही ध्यान गया है। यह नहीं कहा जा सकता है कि अंग जनपद में नाग-पूजा या नाग-अलंकरण कब प्रारम्भ हुआ। संभवत: इसका आरम्भ इस प्रदेश में सिन्धु-सभ्यता के पूर्व ही हो चुका था। 1970-71 में पटना विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग द्वारा डॉ. बी.पी. सिन्हा के निर्देशन में जब चम्पा (भागलपुर) के कर्णगढ़ में खुदाई हुई, तब उसमें कई पुरावशेषों के साथ नाग-नागिन की खूबसूरत जोड़ी भी मिली, जिसके मस्तक मानव के हैं। इतिहासकारों ने खुदाई की मिट्टी की परतों ये यह बताया है कि यह सभ्यता सिंधुकालीन है। खुदाई में टेराकोटा की मिली यह नागकला स्पष्ट करती है कि अंगप्रदेश में तब भी नागपूजा चरम पर थी।

मंजूषा लोककला में जो मानव की आकृतियां बनती हैं, वह बहुत कुछ अंग्रेजी के वर्ण X जैसी होती हैं। पुरुष और स्त्री के चित्र दर्शाने के लिए चित्रों में जहां एक ओर शिखा और मूंछ के अंकन की परम्परा है, वहीं स्त्री की आकृति के लिए वक्ष पर दो वृतों को बनाया जाता है। वैसे, जो पुरुष आकृति होती है, उसकी गर्दन स्त्री की आकृति से थोड़ी अवश्य मोटी होती है। जहां ये आकृतियां एक ओर कानविहीन होती हैं, वहीं दूसरी ओर इनकी आंखें अनुपात की दृष्टि से बड़ी हैं, जो आकृतियों को भव्यता ही देती हैं। यहां यह विशेष रूप से बताना जरूरी होगा कि मंजूषा पर जो पंचमुखी नाग का अंकन होता है, वह मनसा (पांच बहनों) की ही प्रतीक है, जिसके साथ एक पतली रेखा में नाग का भी अंकन कर दिया जाता है। इन बातों के अतिरिक्त, यह भी लगता है कि मंजूषा पर जो सूर्य और चांद के चित्र उभारे जाते हैं, वे कहीं ना कहीं साम्प्रदायिक सद्भाव के ही चिन्ह हैं। इतिहासकार ज्योतिष चन्द्र शर्मा ने अपने इतिहास ग्रन्थ ‘प्राचीन चम्पा’ में अंगिका भाषा की लोकगाथा बिहुला और कई इतिहास साक्ष्य के आधार पर इस ओर संकेत किया है कि चंद्रधर सौदागर ने लखिन्द्र की शादी पर मुहम्मद साहब की बेटी फातिमा को भी निमंत्रित किया था और बीबीफातिमा ने अपने पुत्रों को विवाह के उत्सव में शामिल होने के लिए भेजा था। अगर यह बात पूरी तरह से इतिहास सिद्ध हो जाती है, तो मंजूषा पर बने चांद के चित्र का सत्य भी उजागर हो जाएगा और यह बात भी कि चन्द्रधर सौदागर का समय क्या रहा होगा।

आधुनिक समय में इस मंजूषा कला की खोज सर्वप्रथम 1941 में आई.सी.एस. पदाधिकारी डब्ल्यू जी. आर्चर ने की थी और इसे एक राष्ट्रीय धरोहर के रूप में पहचान दी। उन्होंने अंगप्रदेश के माली परिवारों द्वारा बनाए जाने वाले मंजूषा चित्रों को किसी काल में लंदन के इंडिया हाउस में भी प्रस्तुत किया था। नए समय में जुड़ाव, परिधि, अर्णव, नवार्ड जैसी संस्थाओं ने इसे विश्वधरोहर रूप में पहचान देने की सार्थक पहल की है, जिनमें ज्योतिष शर्मा, शेखर, मनोज पाण्डेय, अपर्णा सिंह, ओमप्रकाश पाण्डेय, राजीव सिन्हा की भूमिकाएं निस्संदेह कालजयी हैं।

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