समाज ने ‘अवरोध’ खड़े किये, हमने उन्हें अवसर में बदल दिया: शांति देवी

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Shanti Devi, Master artist, Mithila painting, Lahariaganj, Madhubani, Bihar, 2018 ©Folkartopedia
Shanti Devi, Master artist, Mithila painting, Lahariaganj, Madhubani, Bihar, 2018 ©Folkartopedia
अवरोध अवसर भी हो सकते हैं, मिथिला कला में शांति देवी की कला यात्रा इस बात को साबित करती है। जब-जब अवरोध सामने आए, शांति देवी उन्हें अवसर में बदलती गयीं।

मिथिला की ख्यातिलब्ध लोककलाकार शांति देवी का नाम दलित कलाकारों में यमुना देवी और चानो देवी के साथ सम्मान से लिया जाता है। अपने चित्रों में विविध प्रयोगों और स्वभाव में जीवटता की वजह से शांति देवी देश ही में नहीं, विदेशों में भी चर्चित रही हैं। यहां चर्चा अबतक की उनकी कला यात्रा की। शांति देवी की कला यात्रा को दो खंडों में बांट कर देखा जा सकता है। 1980 से पूर्व और 1980 के पश्चात्। अपनी कला यात्रा के दोनों ही खंडों में शांति देवी की चित्रकला अपनी विशिष्टता साबित करती है।

शांति देवी का जन्म 4 मार्च 1958 को मधुबनी के रहिका प्रखंड के सीमा गांव में रामचन्द्र पासवान और कौशल्या देवी के घर हुआ। शांति देवी महज चार वर्ष की थीं, जब रामचंद्र पासवान का निधन हो हुआ। बेहद मुश्किल हालातों में शांति देवी और उनके भाई की परवरिश हुई। पढ़ने के प्रति जुनूनी शांति देवी ने तमाम सामाजिक अवरोधों एवं प्रतिरोधों के बावजूद दसवीं तक की शिक्षा प्राप्त की और पंद्रह वर्ष की आयु में उनका गठबंधन लहेरियागंज के शिवन पासवान से हुआ।

ससुराल भी बहुत समृद्ध नहीं था। जुझारू प्रवृत्ति की शांति देवी ने तब परिस्थितियों से लड़ते हुए एक स्कूल में अध्यापन कार्य शुरू किया, लेकिन जातिगत भेदभावों एवं विरोधों की वजह से वह कार्य भी छिन गया। यह वही समय था जब लहरियागंज से सटा गांव जितवारपुर मिथिला कला के केंद्र के रूप में उभर रहा था और जहां का दलित समाज भी चित्रकला में खुद को स्थापित कर रहा था। दलित कलाकारों में दो नाम, यमुना देवी और चानो देवी चर्चित रहे थे। उनमें चानो देवी बतौर गोदना कलाकार अपनी पहचान बना चुकी थीं और चित्रों से उन्हें सम्मानजनक आमदनी होने लगी थी।

चानो देवी और शांति देवी का परिवार निकट संबधी था, इसलिए अध्यापन कार्य छूट जाने के पश्चात् चित्रकला की तरफ शांति देवी का रुझान हुआ। चानो देवी के प्रेरणा से शिवन पासवान और शांति देवी, दोनों ने गोदना चित्र बनाना शुरू किया। इसमें रौदी पासवान की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिन्होंने उन दोनों को उसी जायदा नटिन से मिलवाया, जिसने चानो को गोदना चित्र बनाना सिखाया था। जायदा गोदना गोदने के साथ-साथ गीत भी गाती थीं। जायदा के गीत शांति देवी के कंठों में भी बस गए।

Motiram with tigers, 1983, Shanti Devi, Courtesy EAF Records

पढ़ी-लिखी और तेजतर्रार शांति देवी ने जल्दी ही गोदना चित्रकला से आगे बढ़ते हुए मिथिला चित्रकला के पारंपरिक विषयों का चित्रण एवं उनके प्रतीकों का गोदना कला के केंद्रक में स्थापित राजा सलहेस के साथ प्रयोग करना शुरू किया। अनजाने में किए गए इन प्रयोगों ने तत्कालीन कला प्रेमियों को चौंकया, तो कुछ लोगों की भृकुटियां भी तन गयीं।

जाहिर है, शांति देवी के चित्रों को व्यावसायिक सफलता मिलने लगी। इस क्रम में उन्हें एक बड़ा प्रोत्साहन 1977 में मिला जब वह पटना में उपेंद्र महारथी से मिलीं। महारथी ने उन्हें अपना बाजार में चित्र बेचने के लिए प्रेरित किया। तब मिथिला चित्रों की बिक्री ग्रेड के हिसाब से अधिकतम 22 रुपये में की जा रही थी। शांति देवी के एक चित्र से प्रभावित होकर महारथी ने उसे 150 रुपये में खरीदा। इस प्रोत्साहन से शांति देवी की चित्रकला में पंख लग लग गए। 1979-80 में शांति देवी को बिहार सरकार द्वारा राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

पटना में ही शांति देवी की मुलाकात यमुना देवी से हुई। शांति देवी के मुताबिक, यह मुलाकात पटना में हुई एक प्रदर्शनी में हुई, जिसमें यमुना देवी के अलावा चानो देवी, रौदी पासवान, गौरी मिश्रा और रेमण्ड ओवन्स की भागेदारी थी। यमुना देवी ने यहां उन्हें गोबर पानी से कागज को परिष्कृत करने की तकनीक सिखाने की बात कही और उन्होंने जितवारपुर लौटने के बाद वह तकनीक उन्हें सिखाई भी। शांति देवी ने उस तकनीक का अपने हिसाब से प्रयोग किया। बाद में उन्होंने यमुना देवी शैली में आकृतियों का आउटलाइन बनाना शुरू किया जिसमें यमुना देवी बहुधा काले रंग के डॉट्स का प्रयोग करती थीं। इससे आकृतियों के बीच की सतह सफेद ही रहती थी और चित्र ज्यादा आकर्षक दिखते थे।

1977 से लगातार मिथिला चित्रों पर रिसर्च और उन्हें विदेशों में प्रमोट कर रहे अमेरिकी एंथ्रोपोलॉजिस्ट रेमण्ड ली ओवन्स 1979-80 के दौरान ही शांति देवी के संपर्क में आए। उनकी कला और उनके गोदना गीतों ने रेमण्ड को खूब प्रभावित किया। रेमण्ड ने शांति देवी को कला की दृष्टि से और एक खरीदार की हैसियत से खूब प्रोत्साहित भी किया। उन्होंने शांति देवी के अनेक चित्र खरीदे और 1983 में जब उन्होंने मिथिला की पांच महिला चित्रकारों पर वृत्तचित्र का निर्माण कराया, तब उन कलाकारों में शांति देवी भी एक थीं।

1979-80 के बाद शांति देवी की कला तेजी से बदली और उसमें विषयगत प्रयोग तेज हुए, खासकर प्रतीकों और विषयों मसलन, राजा सलहेस के साथ-साथ काली, दुर्गा, महादेव, सूर्य, चंद्रमा, गाय, महिषासुरमर्दिनी आदि के प्रयोगों से उपजे विवाद के बाद। अगड़ी जातियों के विरोध के पश्चात् शांति देवी ने मुख्य रूप से अपने लोकदेवता राजा सलहेस, कुलदेवता कारिख पंजियार, दीना-भद्री और उनसे जुड़ी दंतकथाओं के चित्रण पर स्वयं को केंद्रित किया। साथ-ही-साथ सामाजिक कुरीतियों, समस्याओं और राजनीतिक विषयों जैसे डायन प्रथा, दहेज, बाल विवाह, बाढ़ और उससे उपजे हालात, नेताओं के दौरे-भाषण आदि को अपने चित्रों का विषय बनाया। बाद में उन्होंने रामायण-महाभारत की कथाओं, भगवान बुद्ध के जीवन-चरित्र-दर्शनों और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के सामाजिक जीवन-दर्शन पर आधारित चित्र भी बनाए।    

Shanti Devi standing by her painting in Mithila Museum, Japan.

1981 दिल्ली में रौदी पासवान, चानो देवी और चंद्रकला देवी के साथ शांति देवी की मुलाकात जाने-माने क्राफ्ट प्रमोटर राजीव सेठी से हुई, जिन्होंने उनकी कला से प्रभावित होकर उन्हें प्राकृतिक रंग बनाना सिखाने का आश्वासन दिया। शांति देवी के मुताबिक, राजीव सेठी और पुपुल जयकर ने तब डॉ. चद्रमौली को प्राकृतिक रंगों पर शोध एवं प्रशिक्षण देने के लिए जितवारपुर भेजा, जिन्होंने उन्हें प्राकृतिक रंग बनाना और उनके प्रयोग का तरीका सिखाया। विषयों के प्रयोग, विविधता और रंगों के माध्यम से उनके परिष्कारण से शांति देवी की चित्रकला निखरकर सामने आई। यमुना देवी ने लगभग इसी समय अपनी चित्रकला में सिंथेटिक रंगों एवं ब्रश का प्रयोग किया, हालांकि कुछ स्थानीय कलाकारों का यह भी मानना है कि दलित चित्रकारों में सिंथेटिक रंगों एवं ब्रश का पहला प्रयोग शांति देवी ने किया था।

बहरहाल, भास्कर कुलकर्णी, पुपुल जयकर, उपेंद्र महारथी और मनु पारेख जैसे कलाकार शांति देवी की चित्रकला में प्रयोगों की विविधता से प्रभावित थे। शांति देवी की प्रयोगधर्मिता को बिहार सरकार पहले ही सम्मानित कर चुकी थी, भारत सरकार ने भी उन्हें 1984 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया।

शांति देवी का कलाकर्म अनवरत जारी है। भारत के लगभग सभी प्रमुख कला केंद्रों में उनकी कला प्रदर्शित की जा चुकी है। उन्होंने विदेशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया है, जिसमें डेनमार्क, जर्मनी, मलेशिया, दुबई और जापान शामिल है। अमरीका के अलावा इन सभी देशों में उनकी कलाकृतियां संग्रहित हैं।

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