टिकुली कला का वर्तमान स्वरूप: परंपरा या आधुनिक घटना?

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An artwork of Tikuli painting, Patna, Bihar.
An artwork of Tikuli painting, Patna, Bihar.
टिकुली कला का मौजूदा चलन करीब चार दशक पुरानी घटना है जिसमें जगदंबा देवी की चित्र शैली टिकुली कला की प्रामाणिक शैली मान ली गयी और अब वह बाजार का हिस्सा है।

राकेश कुमार झा, प्रबंध निदेशक, क्राफ्टवाला डॉट कॉम । मिथिला चित्रकला के अध्येता, मिथिला स्कूल ऑफ आर्ट्स से संबद्ध ।

टिकुली कला बिहार की बेहतरीन शिल्प-कलाओं में से एक है। इसका अपना एक समृद्ध और पारंपरिक इतिहास है। ‘टिकुली’ शब्द ‘बिन्दी’ का स्थानीय शब्द है। कहा जाता है कि बिहार में टिकुली कला करीब 800 वर्ष पूर्व पटना में शुरू हुई थी। ये खूबसूरती से तैयार किए गए चित्र होते थे। पटना उसके निर्माण एवं विक्रय का समृद्ध केंद्र था। मध्यकाल में मुगलों ने इस कला में खास दिलचस्पी दिखायी और उसे राजकीय संरक्षण दिया, जिससे उसके प्रचार-प्रसार में काफी सहायता मिली।

बिहार की इस दुर्लभ कला को साकार करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल थी और उसे बनाने के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती थी। इस पर अलग से चर्चा की जाएगी। लेकिन, बिहार की इस पारंपरिक कला को मुगल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजों के आगमन से गंभीर झटका लगा। अंग्रेजी शासन के दौर में टिकुली सहित कई स्वदेशी कलात्मक वस्तुएं मशीनों द्वारा निर्मित होने लगीं जिससे हजारों पारंपरिक कलाकार बेरोजगार हुए। मशीन निर्मित टिकुली के बीच असली टिकुली कला कहीं खो गई।

आजादी के बाद चित्राचार्य पद्मश्री उपेंद्र महारथी की कोशिशों से यह कला कुछ हद तक पुनर्जीवित हुई। जापान प्रवास के दौरान उन्हें हार्ड-बोर्ड पर टिकुली कला को पारंपरिक शैली में उतारने का खयाल आया, ताकि बाजार के साथ भी उसे जोड़ा जा सके। उन्होंने इसके निर्माण की एक प्रकिया विकसित की। प्रक्रिया यह थी कि मासोंनाइट बोर्ड पर इनेमल पेंट की एक-के-बाद एक 12 परतें चढ़ायी जाये और सूखने पर उसे काठ (लकड़ी) कोयले से घिसकर कांच समान चमकीला बना उस पर चित्रकांन किया जाये। चित्र किस तरह के बनाये जाएं, इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं लिखा।   

टिकुली शिल्प या कला का मौजूदा चलन करीब चार दशक पुरानी घटना है। 1982 में एशियाड गेम्स के प्रतियोगियों और अतिथितियों को सम्मानित करने हेतु उन्हें एक-एक चित्र दिया जाना था। तब पूर्व लिखित प्रक्रिया के तहत तैयार मार्सोनाईट बोर्ड पर मधुबनी पेंटिंग की प्रथम पद्मश्री जगदंबा देवी की चित्र-शैली में चित्र उकेर गया और उन चित्रों से उपहार स्वरूप देकर खिलाड़ियों और अतिथियों को सम्मानित किया गया। तब से जगदंबा देवी की चित्र शैली टिकुली कला की प्रामाणिक शैली मान ली गयी और अब वह बाजार का हिस्सा है।

इसके दो दुष्परिणाम हुए। पहला, पारंपरिक टिकली कला विलुप्त हो गयी और दूसरा, कला बाजार ने जगदम्बा देवी शैली के चित्रों को मिथिला चित्र मानने से ही इनकार कर दिया। टिकुली कला के नाम पर आज बिहार सरकार हर वर्ष लाखों रुपये खर्च कर रही है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि टिकुली कला पर गंभीर शोध हो, ताकि न केवल वह कला पुनर्जीवित हो सके, बल्कि मिथिला कला में जगदंबा देवी शैली को भी जीवनदान मिल सके।

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