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Coverage

लोक परंपरा का कला उत्सव
जय त्रिपाठी
कला संपादक, राष्ट्रीय सहारा, नोएडा

सांस्कृतिक धरोहर से उत्पन्न भारतीय चित्रकला की लोक कला एक जीवंत परंपरा है, जिसमें समृद्ध विविधता है। सदियों बाद भी आज भी गुफा चित्रों को देख कर कहा जा सकता है कि लोक और जनजातीय चित्रकला ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों से आती है। लोक कलाकार कलात्मक अभिव्यक्ति में प्रकृति के उस स्वरूप को चित्रित करते हैं जहां लोक चित्रकला मात्र कला के रूप में ही नहीं वरन दैनिक जीवन में किए जाने वाले धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान के रूप में जागृत हुई। मिट्टी के घरों की दीवारों और फर्श को रंगते हुए लोक चित्रकला आज अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में व्याप्त है। जीवंत परंपरा के साथ-साथ वैचारिक दृष्टि से भी व्यापक होती लोक कला आज अपने उस उच्च स्तर पर आ पंहुची है, जहां फोकार्टोपीडिया जैसी संस्थाएं लोक कला का आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर कर रही हैं।

फोकार्टोपीडिया ने लोक कला को कला के उस रूप में परिभाषित किया है, जो समाजिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप में पुरस्कृत कला से परिष्कृत होती यात्रा है। यह कला आयोजन पटना स्थित कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स में ‘लोक परंपरा का उत्सव’ शीर्षक से आयोजित किया गया। त्रिदिवसीय राष्ट्रीय लोक चित्रकला के उद्घाटन के अवसर पर बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री मोतीलाल प्रसाद ने देश भर की अनेक विधाओं को राष्ट्रीय स्तर पर लाने वाले इस आयोजन के लिए फोकार्टोपीडिया की प्रशंसा करते हुए वि धरोहर दिवस की बधाई भी दी और कहा कि उत्सव के साथ-साथ हमें अपनी लोक कलाओं को अक्षुण्ण रखने की भी जरूरत है।

भारतीय लोक कला को समृद्ध बनाने के लिए फोकार्टोपीडिया के संस्थापक निदेशक सुनील कुमार को कई कलाकारों ने लोक कला के लिए प्रेरित किया है और सुनील कुमार ने भी इन कलाकारों में भाव भरे कि कला न केवल रचनात्मकता की अभिव्यक्ति है, बल्कि यह अपने आप में एक अनुष्ठान है। प्रदर्शित चित्रों एवं व्याख्यानों से यह बात विशेष रूप से निकल कर आती है कि भूगोल और जलवायु द्वारा एक विशेष स्वरूप में आकार लेती लोक चित्रकला परंपराओं को संरक्षित एवं प्रचारित-प्रसारित करने की आवश्यकता है। विशिष्ट क्षेत्रीय संस्कृतियों द्वारा आकार लेती यही लोक कला कलाकारों और संरक्षकों की पहचान को विशिष्ट बनाती है।

दो दिनों के विमर्श के दौरान विभिन्न सत्रों में लोक कलाओं की पारंपरिक पहचान, समकालीन प्रयोग और सामाजिक प्रासंगिकता पर विमर्श हुआ जिसमें यह बात भी सामने आई कि क्षेत्रीय लोक कलाएं वैश्विक मंच पर किस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती हैं तथा पारंपरिकता और नवाचार के संतुलन को कैसे बनाए रखा जा सकता है। आयोजन का प्रमुख उद्देश्य पारंपरिक कला और आधुनिक बाजार की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना है, ताकि कलाकारों को सामाजिक-आर्थिक समर्थन मिल सके। कला की आत्मा भी सुरक्षित रह सके। इस लोक उत्सव में पद्मश्री शांति देवी सहित कई लोक कलाकार के चित्रों को प्रदर्शित किया गया।

बिहार कला संस्कृति विभाग की डायरेक्टर रु बी, दिल्ली से प्रसार भारती बोर्ड के चैयरमैन नवनीत सहगल और फैकल्टी ऑफ आर्किटेक्चर एंड प्लानिंग, लखनऊ की डीन एवं प्राचार्या वंदना सहगल, मृदुला प्रकाश, विनय कुमार, नीलम चौधरी, पद्मश्री लोक कलाकार अशोक विश्वास एवं कलाकार गीतांजली ने फोकआर्टोपिडिया के आयोजन को सराहा। विजय प्रकाश ने कहा कि उन्होंने पहली बार ऐसी प्रदर्शनी देखी जहां भारत के 18 आर्ट फोरम देखने को मिले। ‘लोक परंपरा का उत्सव’ लोक परंपरा पर विमर्श गंभीर मंथन को संदर्भित करता है, जिसमें पारंपरिकता और नवाचार का संतुलन कैसे बनाए रखा जा सके,इस पर भी विचार हुआ। यह बात भी चर्चा में रही कि बिहार में लोकचित्रकलाओं पर केंद्रित यह अपनी तरह का पहला राष्ट्रीय आयोजन है।

समकालीन प्रयोग और सामाजिक प्रासंगिकता पर विमर्श के दौरान आयोजन के समूचे परिदृश्य से यह बात विशेष तौर पर निकल कर आई कि फोकार्टोपीडिया ने लोक कलाओं पर काम करने वालों को ऐसा मंच दिया है जिससे लुप्तप्राय हो रही कलाओं को न सिर्फ संरक्षित किया जा रहा है, बल्कि आम लोगों की जिंदगी में भी लोक कला नई जगह बना रही है। प्रदर्शनी में कावी आर्ट, जूट आर्ट, जादोपटिया, गोंड, उराव, खोवर, चितारा, पट्टिचत्र, पिछवइ, पिथोड़ा, फड़, भील, भोजपुरी, मधुबनी, वरली, सुरपुर और सोहराइ जैसी लोकचित्र परंपराओं से जुड़ी देश भर के कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं।

कला जीवन में लोक चेतना
जय त्रिपाठी
कला संपादक, राष्ट्रीय सहारा, नोएडा


कलाकारों, कला लेखकों और कला प्रेमियों को एक साथ लाती कला गोष्ठी ज्ञान और विचारों के आदान-प्रदान का महत्त्वपूर्ण मंच होती है जो कलाकार और कला के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कुछ इसी प्रारूप के साथ विगत सप्ताह आयोजित कला गोष्ठी पूरी तरह से गंभीर मंथन का स्वरूप लेकर विचारों, शोधों और रचनाओं को साझा करते हुए नये विचारों को जन्म दिलाती गई। डॉ. हरिवंश राय बच्चन का कथन भी है कि “गोष्ठी एक ऐसा मंच है जहां विचारों का आदान-प्रदान होता है, और ज्ञान की वृद्धि होती है।” इसी दिशा को और गति देते हुए कंचन कला दीर्घा एक और नया कदम बढ़ाती है। दीर्घा का शुभारंभ लोक कलाकारों के चित्रों की प्रदर्शनी एवं लोक कला गोष्ठी के विशेष सत्र के आयोजन द्वारा किया गया।

विगत कई वर्षों से गुरुग्राम स्थित “विमला आर्ट फोरम” की संस्थापक एवं संरक्षक कंचन मेहरा एवं दिलीप शर्मा की रचनात्मक दूरदर्शिता के साथ इस फोरम को निरंतर एक नई दिशा देने को प्रयासरत रही है जो यह भाव देता है कि कलाकारों को समाज के प्रति जागरूक होना चाहिए और अपनी कला के माध्यम से समाज को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। संक्षेप में कहें तो कला को मानव भावों से परिपूर्ण और समाज को बेहतर बनाना है।

हिन्दी साहित्य के महान विद्वान समादृत आलोचक,निबंधकार,साहित्य,इतिहासकार और अनुवादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल कला और नैतिकता को एक दूसरे से अलग नहीं मानते थे। उनका मानना था कि कला को नैतिक मूल्यों का समर्थन करना चाहिए और समाज को बेहतर बनाने में योगदान देना चाहिए। कुछ इसी भाव से देश के मूर्धन्य कलाकार, कला चिंतक अशोक भौमिक ने अपने बेबाक राय रख कर लोक कलाकारों की मूल कठिनाइयों पर सवाल खड़े किए और विश्व को एक देश के स्वरूप में देखने की बात कही…कि लोक कलाकारों की जीवन स्थिति की दिशा में सरकारों ने कोई पहल नहीं की और न ही की जाती है जैसा चिंतनीय पहलू को स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया।

लोक चित्रों से सुसज्जित गैलरी के शुभारंभ के साथ आयोजित कला चर्चा में पूरी तरह से गंभीर मंथन में भौमिक ने लोक कलाकारों और आधुनिक कलाकारों में भेद को न करने को कहते हुए कहा कि हम लोक कलाकारों को समानता का दर्जा देने की बात करते हैं, किंतु उन्होंने कभी नहीं कहा कि उन्हें कलाकार का दर्जा दिया जाए और न ही कभी खुद को कलाकार कहलानेे का आग्रह किया। भौमिक ने कला पुरस्कारों को भी निशाना बनाया। लोक कलाओं और आधुनिक कला के उद्देश्य में अंतर को स्पष्ट करते हुए वह कहते हैं कि लोक कलाएं जीवन से सीधी जुड़ी होती हैं। आधुनिक कलाकार की पहचान है, उसके नाम से होती है किंतु लोक कलाकार के साथ ऐसा नहीं हुआ।

वहीं लोक कला व कलाकारों के सर्वागीण विकास का बीड़ा उठाने का संकल्प लिए युवा पीढ़ी के सुनील कुमार ने लोक कला व कलाकारों की संवेदनशील दृष्टि व उनकी संभावना पर विचार पर प्रकाश डाला। लोक कलाकारों के साथ अपने अनुभवों को साझा करते हुए उनकी आर्थिक स्थिति की बात करते हुए शांति देवी और जमुना देवी की कठिन कला यात्रा का उदाहरण दिया। इन जैसी कलाकारों ने सामाजिक संरचना को भी रचा है, एवं बताया कि अनेक लोक कलाकार महाराष्ट्र में होने वाले दलित आंदोलन से लेकर गिरीश कर्नाड के नाटकों तक कैसे प्रभावित रहे, जो बदलाव का संकेत है।

कला पत्रिका “आर्ट न्यूज इंडिया” के संपादक एवं वरिष्ठ कलाकार वेद भारद्वाज ने समकालीन कलाकारों व लोक कलाकारों के स्वरूप पर विचार करते हुए अपनी बात कही। भारद्वाज ने लोक कलाओं की समस्याओं की बात करते हुए उसमें बदलाव न होने की बात कही। उन्होंने कहा कि आधुनिक कलाकार और कला बाजार लोक कलाओं को बदलने से रोकते हैं, और चाहते हैं कि लोक कलाकार वही सब रचते रहें जो हजारों सालों से रास्ते आए हैं।

देश के वरिष्ठ कलाकार कला लेखक सुमन कुमार सिंह ने लोककला के स्वरूप की निरंतर निश्चित यात्रा के विषय में भी हमें सोचना होगा, इस ओर ध्यान आकर्षित किया। सुमन कुमार सिंह ने इस अवसर पर लोक कलाओं के साथ लोक जीवन की परंपराओं के विस्मरण की बात कही। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में अच्छा काम हो रहा है। फिर भी लोक मानने वाले विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोग शामिल हैं। गहन मंथन से यह विमर्श आया कि इस तरह के संवाद होने की अधिक आवश्यकता है। कुल मिलाकर भारतीय लोक कला को मुख्यधारा की कलात्मक चेतना में लाया जाने वाला यह प्रयास संभावना जगाता है।

भावात्मक अभिनय की नई दृष्टि
जय त्रिपाठी
कला संपादक, राष्ट्रीय सहारा, नोएडा



कलाओं के माध्यम से कलाकार सामान्य से दिखते विषय को भी आसाधारण बना देते हैं क्योंकि उनमें कलात्मक निष्कर्ष प्राप्त करने हेतु रचनाशीलता एवं सौंदर्यबोध सा विवेक होता है। नई दिल्ली की अर्पणा फाइन आर्ट गैलरी में विश्व शिल्प दिवस के अवसर पर पटना स्थित फोकार्टोपीडिया फाउंडेशन ने ‘सेलिब्रेशन ऑफ फोक आर्ट्स ट्रेडिशंस’ लोक कला उत्सव का आयोजन किया। कार्यक्रम के दौरान समकालीन कलाकार बिपिन कुमार ( Bipin Kumar ) के परफॉर्मिंंग आर्ट (कला प्रदर्शन) द्वारा उठाया गया संदर्भ कला के अभिधेय अर्थो की सीमा पार करके जिस प्रकार एक अन्य अर्थ को ध्वनित करता है, वह इस ठोस वैश्विक सामाज के भीतर एक रूपांतरित सत्य को दर्शाता है।

सामाजिक चेतना जगाता कलाकार समय के तेज होते सामाजिक परिवर्तन को जब आम जन के समक्ष अपने प्रदर्शन से नाटकीय रूप देता है , तो यह आम समझ बनने में देर नहीं लगती कि वह पहले से ही दृष्टिगोचर कठोर सामाजिक पीड़ा को कितना आत्म सात किए हुए है। बिपिन जगत को अपनी रुचि, कल्पना आदि के साथ-साथ समाज के सुख-दुख में गुंथा हुआ देखते हैं। अत: अपनी परफॉर्मिंंग आर्ट के दौरान स्वयं के रचना कौशल की विशेष दृष्टि से जब भावात्मक अभिनय का प्रदर्शन करते हैं तो वह कई भाव-भंगिमा लिए हुए होता है।

बिपिन मूर्तता को अमूर्तता की दिशा देते प्रभावशाली कलाकार हैं। जाहिर है कि उनको कला प्रदर्शन में अति समकालीन कला के प्रत्यक्ष रूप से वैश्विक होती प्रतिक्रिया का प्रभाव भी दिखलायी पड़ता होगा। क्योंकि वह अपने मंचन से दर्शकों के समक्ष इस रूप में नाटकीयता भरा प्रभाव डालते हैं जैसे कि घटना आपके-हमारे साथ घटित हो रही हो। इस कौशल प्रदर्शन से एक बात और स्पष्ट होती दिखती है कि इधर जो परिवर्तन कलाकारों में अप्रत्यक्ष रूप से दिखाई दिया है, वह कला के प्रभाव या अनुकरण करने की चेष्टा भर नहीं है, बल्कि आधुनिक युग के विचारों के कारण हुआ है। और जिस युग में हम वास कर रहे हैं, उसमें विज्ञान और टेक्नोलॉजी की अभूतपूर्व उन्नति के कारण अन्याय और न्याय युगों से भिन्न हो गया है। एक काल चक्र की भांति जीवन के चक्र को संदर्भित करते बिपिन इस प्रकार की चेष्टाओं का अभिनय करते हैं।

एक गोलाकार के मध्य यह कलाकार भिन्न-भिन्न रसों और भावों के अभिनय से इस प्रकार के रंगमंच की सजावट करता है जैसे कोई सधा हुआ अभिनय करता रंगमंच का कलाकार हो। वेश-विन्यास, मूक भाषा एवं प्रदर्शन की गति भावात्मक अभिनय को नई दृष्टि देती है। अभिनय शब्द का अर्थ भी वह क्रिया है जो दर्शक को रसानुभूति की ओर ले जाए। रंगमंच के प्रदर्शन की भांति वह इसे अत्यधिक यथार्थवादी बनाने का प्रयास नहीं करते क्योंकि संभवत: यह कलाकार मंच और दृश्य कला के अंतर को भली-भांति समझता होगा।

समकालीन कलाकारों को समझने का जैसा वैश्विक अवसर आज मिला है वैसा पहले नहीं मिलता था। फिर भी इस युग में कलाकार अनेक दृष्टिकोण से अपने-अपने पहलू पर अत्यधिक जोर देने के कारण भिन्न दिखते हैं, भिन्न होती इस दृष्टि में बिपिन कुमार जीवन के मानसिक,आर्थिक और सामाजिक पक्ष पर अति व्याप्तियों से चिंतित होकर संवेदनशील दृष्टि से अपने विचारों का कोई न कोई असर डालते नजर आते हैं। कलाकार वैश्विक चिंताओं के प्रति अपने कला प्रदर्शन के माध्यम से कलात्मकता अनुरूप दर्शक के भीतर प्रवेश करने की चेष्टा करता रहा है, चाहे वह जल संकट हो या सामाजिक असुंतलन हो।

आधुनिक अमूर्त कलाकार बिपिन कुमार का अर्पणा फाइन आर्ट गैलरी में कलाकारों, कलाप्रेमियों व प्रसिद्ध मधुबनी चित्रकार शांति देवी के मध्य प्रदर्शन बताता है कि वह वस्तु को आत्मनिरपेक्ष भाव से देखने को ही सच्चा देखना मानते हैं। बिपिन उस व्यक्ति का उदाहरण देकर प्रदर्शन करते हैं जो अपने गांव ,घर छोड़कर शहर की ओर आता है। जीवन के इस आपाधापी भरे पक्ष का मंचन उनकी उत्कर्ष एवं संवेदनशील भावाभिव्यक्ति रही है। यह परफॉर्मिंंग आर्ट संदेश भी देती है कि जाने-अनजाने में हमारा तत्ववाद हमेशा हमारे क्रियाकलाप को नियंत्रित करता रहता है। विचार के क्षेत्र में वह अधिक स्पष्ट और सुनिश्चित रूप में आता है। इससे एक बात और भी स्पष्ट हो जाती है कि कलाकार के अज्ञात कोने में जो हलचल होती रहती है, वह प्रत्यक्ष जीवन के मूल्यों को अपनी कला के आयामों द्वारा अवश्य प्रदर्शित करती है।

लोक संस्कृति का दस्तावेजीकरण
जय त्रिपाठी
कला संपादक, राष्ट्रीय सहारा, नोएडा

दुनिया में कहीं भी जीवित परंपराएं उसकी सांस्कृतिक विरासत हैं, जो लगातार विकसित भी होती हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती हैं एवं खुद को नया रूप देती हैं। कला रूपों की संख्या सबसे अधिक भारत में है, इसका मुख्य कारण यह है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत समृद्धता के साथ विविधता और जीवंतता लिए हुए है। लोक कला परंपराओं की चित्र अभिव्यक्ति में समृद्ध विविधता का विषय प्रकृति, आध्यात्मिकता, स्थानीय लोक कथाओं और किंवदंतियों से संबंधित रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली लोक और जनजातीय चित्रकला विभिन्न रूपों में मात्र एक चित्र के रूप में नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में सामाजिक और धार्मिंक अनुष्ठान के रूप में भी प्रचलित हैं। अत: कहा जा सकता है कि दैनिक जीवन को समृद्ध बनाती और कलाकारों को आजीविका प्रदान करती लोक कला प्राचीन समय से आज तक धार्मिंक परंपराओं के रूप में विद्यमान रही है जो अपने परिवेश के प्रति सहज चिंतन को भी दर्शाती है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, ‘लोक शब्द का अर्थ जनपद अथवा ग्राम समुदाय नहीं है, बल्कि वह समूची जनता है जिसके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं हैं, वह सरल एवं अकृत्रिम जीवन की अभ्यस्त है।’

भारत की ऐसी वैविध्य भरी लोक चित्रकला और कलाकारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका के बारे में उनके दस्तावेजीकरण की दिशा में फोकार्टोपीडिया फाउंडेशन के प्रयास प्रशंसनीय हैं। उनके इस प्रयास ने जनजातीय और लोक चित्रों की एक समृद्ध टेपेस्ट्री को संरक्षित कर नया जन्म दिया है। किसी पेंटिंग की उत्पत्ति या तो धार्मिंक हो सकती है या प्राचीन लोक ज्ञान पर आधारित हो सकती है। प्रत्येक पेंटिंग एक क्षेत्र की सौंदर्य, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संवेदनशीलता को प्रतिबिंबित करती है। इसीलिए लोक कला संस्कृति की रीढ़ की हड्डी है। अत: उसे जीवित रखने का पूर्ण प्रयास होना चाहिए ताकि कलाकारों के सरल भाव सदैव समाज में लोक कला का आधार बनें। पिछले दशकों में संस्कृतियों के संरक्षण पर और उनके उत्थान को लेकर फोकार्टोपीडिया के निदेशक सुनील कुमार तत्परता से प्रयासरत हैं, जिसमें उनकी संस्था कई राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय कला आयोजन कर चुकी है। राष्ट्रीय अकादमियों, संग्रहालयों और यहां तक कि नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट से लेकर गोमती नदी के तट से लेकर बनारस के घाटों पर आयोजित की जा रही गतिविधियों पर नजर डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह भारतीय समाज और संस्कृतियों के बदलने का दौर है।

आज भारतीय लोक संस्कृति और उसके संरक्षण के नाम पर एक बड़ा हिस्सा हाशिये पर दिखता है। देश के दो प्रमुख राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार की अनेक लोक कला एंव चित्रकला परपंराए अब विलुप्ति के कगार पर हैं। उत्तर प्रदेश में चौक पूरना, सांसी, अहोई, अष्टमी, गोवर्धन पूजा, दीवाली, हरछठ आदि मौकों पर किए जाने वाले गेरिक आलेखन और अनेक तरह के आलेपनों की समृद्ध परंपरा खत्म होती दिख रही है। यहां की प्रमुख कलाओं में सांझी माई और कई क्षेत्रों में प्रचलित रही कोहबर कला परंपरा विलुप्त होने की कगार पर है। हालांकि, हाल के वर्षो में कोहबर कला के पुनर्जीवन के कुछ निजी प्रयास हुए हैं। उत्तर प्रदेश में कोहबर कला को पुनर्जीवित करने और उसके प्रचार पर लगातार काम कर रहीं कामता प्रसाद और कुमुद सिंह के मुताबिक प्रदेश में लोक कलाओं की संस्कृति दस्तावेजीकरण नहीं है। किसी भी देश की संस्कृति लोक कलाओं, लोक कथाओं, लोकोक्तियों, लोक गीत-संगीत एंव नाट्य परंपराओं जैसी अनेक कला-विधाओं का समुच्चय होता है। ये कला परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त हो रही हैं। हमें उन्हें सहेजना होगा। नई पीढ़ी को ध्यान में रखते हुए उनका संरक्षण और संवर्धन करके, उनका दस्तावेजीकरण नई पीढ़ी को सौपना होगा।

कई प्रदेशों में साथ-साथ बिहार में लोक-कला परंपराओं की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। लोक कला परंपराओं की अनेक विधाओं के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है, खास तौर पर गोदना कला और लोक नाट्य राजा सलहेस की परंपरा पर। फोकार्टोपीडिया संस्था अपने बेहद सीमित संसाधनों में बिहार सहित देश के अन्य राज्यों में लोक कलाओं के डिजिटल और फिजिकल आर्काइव्स तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है, तत्संबंधित जानकारियों का डिजिटलीकरण करके अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहा है। संस्था के निदेशक सुनील कुमार के मुताबिक लोक संस्कृति और लोक कला परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए जरूरी है कि सरकार के पास इससे संबंधित स्पष्ट कला नीति हो, जिसमें इस दिशा में कार्यरत गंभीर निजी संस्थानों की भागेदारी सुनिश्चित की जाए। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती हुई भारतीय लोक कला इस तरह की संस्थाओं के प्रयास से आज भी देश के कई हिस्सों में जीवित बने रहने के लिए कार्यरत है।

रेणु की कहानियों में ‘लोकरंग
29082020

बिहार के जाने माने साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु अपने साहित्य में लोकतत्वों और जनतत्वों की समावेश की वजह से जाने जाते हैं। रेणु ग्रामीण जीवन के सत्य को न केवल बेबाकी से अपनी कहानियों एवं उपन्यासों में बेबाकी से शामिल करते हैं, बल्कि उन्हें उसी रूप में अपने पाठकों के समक्ष साकार कर देते हैं जिस रूप में वह घटित होता है। फोकार्टोपीडिया की ‘ओसारा सीरीज’ की कला चर्चा आज रेणु की तीन कहानियों के संदर्भ में आयोजित की गयी। ये तीन कहानियां हैं – ठेंस, नैना जोगिन और भित्ति चित्र की मयूरी जिनमें ग्राम्य जीवन, वहां का समाज और उस समाज के साथ कलाकारों का संबंध उजागर हुआ है जो बहुधा बेगारी का रहा है। कलाकारों को आज भी ग्राम्य समाज किस रूप में देखता है, वह छुपा हुआ नहीं है। 

उपरोक्त तीन कहानियों के आलोक में कला एवं शिल्प समाज की वर्तमान दशा-दुर्दशा पर ऑनलाइन चर्चा की गयी जिसमें वार्त्ताकार के रूप में दिल्ली के जाने-माने साहित्यकार रवींद्र त्रिपाठी, मिथिला के चर्चित संस्कृतिकर्मी डॉ. कैलाश कुमार मिश्र शामिल हुए। दिल्ली के वरिष्ठ चित्रकार सुमन सिंह ने इस बातचीत का संयोजन किया। 

खोवर और सोहराई कला: समाज, चिंताएं एवं चुनौतियां 
PRESS RELEASE: 22082020

     

खोवर और सोहराई कला को उसके मूल स्वरूप में संरक्षित करने की जरूरत है, यह ध्यान रखते हुए कि उससे संबंधित समाज आधुनिक समय के साथ कदमताल मिलाकर चल सके। लोककलाओं के आर्काइव्स फोकार्टोपीडिया पर शनिवार देर शाम आयोजित वेबिनार ‘ सोहराई और खोवर: समाज, चिंताएं और चुनौतियां ’ में ये बातें कहीं हजारीबाग में लोक कलाओं के संरक्षण में जुटे विरासत ट्रस्ट के जस्टिन इमाम ने। इस वेबिनार में सोहराई खोवर महिला कला विकास समिति की अलका इमाम और झारखंड के वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी महादेव टोप्पो ने अपने विचार साझा किये। वेबिनार का संचालन वरिष्ठ कला लेखक सुनील कुमार ने किया।

इस मौके पर जस्टिन ने कहा कि खोवर और सोहराई कला प्राचीन काल से लेकर आज तक स्थानीय समाज की भावनाओं से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है कि अन्य सहोदरी कलाओं की तरह इसका व्यवसायीकरण नहीं हुआ है। हालांकि यह कला अब कैनवस और कागज पर भी की जा रही है, लेकिन उस पर भी मिट्टी के रंगों का प्रयोग जारी है। जस्टिन के मुताबिक अर्बन आर्किटेक्चर में खोवर और सोहराई कला की बहुत संभावनाएं है। उन्होंने रांची शहर में एयरपोर्ट से लेकर अन्य जगहों पर की गयी खोवर-सोहराई कला के चित्रण पर चिंता जतायी। उन्होंने कहा कि जिस तरह से उनका चित्रण किया गया है, वह न केवल मूल कला की प्रकृति से भिन्न है बल्कि उसका स्वरूप भी विकृत है।

जस्टिन की बातों को विस्तार देते हुए झारखंड के ख्यातिलब्ध कवि और लेखक महादेव टोप्पो ने कहा जबतक हम अपनी कलाओं को सम्मान की नजर से नहीं देखेंगे, उससे जुड़ी समस्याओं और चिंताओं का निवारण नहीं होगा। इस दिशा में सरकार और निजी संस्थाओं को सम्मिलित रूप से प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि झारखंड की कलाएं और लोकजीवन वहां की सांस्कृतिक पहचान है, लेकिन आज सांस्कृतिक पहचान गौण है जबकि इसका सवाल राज्य के गठन के समय एक प्रमुख आधार था। ऐसे में खोवर और सोहराई जैसी हमारी तमाम कला परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन से हमें अपनी सांस्कृतिक पहचान स्थापित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने इसके लिए राज्य और राष्ट्र दोनों ही स्तर पर गंभीर चर्चाओं की आवश्यकता की तरफ भी उन्होंने ध्यान आकर्षित किया।

सोहराई और खोवर कला में महिलाओं की स्थिति पर अलका इमाम ने विस्तार से चर्चा की। अलका के मुताबिक इस कला संबंधित महिला कलाकारों के लिए उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन नहीं है। कलाकर मुख्य रूप से कृषि से जुड़ी हैं और साथ-साथ कला भी रच रही हैं। इस कला को उनके रोजगार के विकल्प के रूप में विकसित करने के लिए गंभीरता से प्रयास किये जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगमन के मौके पर हजारीबाग रेलवे स्टेशन की दीवार पर खोवर-सोहराई कला का चित्रण किया गया था जिसे काफी सराहना मिली थी। प्रधानमंत्री ने मन की बात में इसका उल्लेख भी किया था। अलका के मुताबिक नयी पीढ़ी को खोवर और सोहराई कला के प्रति जागरूरता करने की जरूरत है ताकि उन्हें बाजार के असमय प्रभाव से बचाया जा सके।

इस मौके पर सुनील कुमार ने कहा कि आधुनिकीकरण का प्रभाव स्वाभाविक तौर पर स्थानीय कला समाज पर पड़ेगा लेकिन हमें इस बात को लेकर सचेत रहने की जरूरत है कि बाजार स्थानीय कला के मूल तत्वों पर हावी नहीं हो जाये। — ।

क्या बाजार की चकाचौंध में गुम हो रही है मंजूषा कला?
PRESS RELEASE: 16082020

बाजार की चकाचौंध के बीच मंजूषा कला तेजी से बदल रही है। यह बदलाव कितनी सकारात्मक है और कितनी नकारात्मक, इस विषय पर फोकार्टोपीडिया के फेसबुक पेज पर रविवार देर शाम आयोजित वेबिनार में गंभीरता पूर्व चर्चा हुई जिसमें पटना के संस्कृतिकर्मी विनय कुमार, भागलपुर के वरिष्ठ कवि और लेखक शिवशंकर सिंह पारिजात, मंजूषा गुरु मनोज पंडित, वरिष्ठ चित्रकार शेखर और नाबार्ड बोलपुर में बतौर एजीएम कार्यरत नवीन रॉय और ने अपने विचार रखे। वेबिनार का संचालन सुनील कुमार ने किया।

इस मौके पर नवीन रॉय ने कहा कि राजकीय संरक्षण के अभाव में यह स्थिति अकल्पनीय नहीं है क्योंकि कलाकारों के समक्ष आजीविका का प्रश्न पहले है। यही वजह है कि उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ट्विटर हैंडल पर मंजूषा कला युक्त मास्क की एक तस्वीर पोस्ट करके उनका धन्याकर्षण करने की कोशिश की थी ताकि मन की बात में वे मिथिला कला के साथ मंजूषा कला की भी चर्चा करें। उन्होंने कहा कि इस अवसर पर उन्हें उम्मीद थी कि केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे स्वतंत्रता दिवस समारोह में अपने कंधे पर मंजूषा कला से अलंकृत दोशाला रखेंगे। हालांकि ऐसा नहीं हुआ, हमें यह इच्छाशक्ति दिखानी होगी।

विषय पर अपनी बात रखते हुए विनय कुमार ने कहा कि मंजूषा कला को राष्ट्रीय स्तर पर कला चर्चा के केंद्र में लाने की जरूरत है। यह तभी संभव होगा जब उसे हम इंडिया आर्ट फेयर और कोच्चि बिनाले जैसी कला जगत की राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों में उसे स्थान दिला पाएंगे। इसके लिए कलाकार अपनी समग्र रचनाधर्मिता के साथ आगे आयें और उन्हें बड़े एक्सपोजर की तरफ ले जाया जाये।  

मंजूषा गुरु मनोज पंडित ने अपनी बात रखते हुए कहा कि मंजूषा कला बाजार की चकाचौंध के बीच गुम होती दिख रही है क्योंकि उसके मूल चरित्र के छेड़छाड़ बढ़ी है। खासतौर पर आकृतियों और रंग विन्यास को लेकर। उन्होंने कहा कि मिथिला चित्रकला में अलंकरण की सधनता बढ़ रही है और यह शुभ संकेत नहीं है। जबकि, वरिष्ठ चित्रकार शेखर के मुताबिक जागरूकता के अभाव में मंजूषा कला को लेकर उसकी सहोदरी कलाओं के साथ एक भ्रम की स्थिति बनी है। यह प्रभाव मंजूषा कला की रेखाओं के बारीक होने और उसमें समसामयिक तत्वों की उपस्थिति की वजह से आया है और इससे बचने की जरूरत है क्योंकि बोल्ड लाइन्स मंजूषा कला की पहचान हैं।

शेखर की ही बात को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ साहित्यकार शिवशंकर सिंह पारिजात ने कहा कि हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि समसामयिकता के प्रभाव में हम मंजूषा कला के मौलिक तत्वों की उपेक्षा नहीं कर दे। उन्होंने कहा कि सरकार इस कला के विकास में जिस तरह से पैसा और संसाधन दोनों ही झोंक रही है, उससे यह चिंता स्वाभाविक है कि कहीं उसके प्रभाव में हमारी कलाएं बाजार की चकाचौंध का शिकार तो नहीं हो रही है।  

मृत्तिका उत्कीर्णन अलंकरण: खतरे में पूर्णिया की सांस्कृतिक विरासत
PRESS RELEASE: 09082020

पूर्णिया के ग्रामीण अंचलों में मृत्तिका उत्कीर्णन अलंकरण की परंपरा अब तेजी से लुप्त हो रही है और अगर उन्हें संरक्षित नहीं किया गया तब हम अपनी एक सांस्कृतिक विरासत खो देंगे। फोकार्टोपीडिया के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आयोजित वेबिनार “डॉक्यूमेंटेशन ऑफ फोक वाइसेस; एन अर्जेट कॉल” के पूर्णिया चैप्टर में इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई जिसमें पूर्णिया अंचल के वरिष्ठ कलाकार एवं कला शोधार्थी संजय सिंह ने वहां की मृत्तिका उत्कीर्णन अलंकरण की परंपरा के समक्ष उत्पन्न खतरों पर चिंता जताई। 

इस वेबिनार में पूर्णिया के जाने-माने संस्कृतिकर्मी डॉ. शंभू कुमार सिंह, सांस्कृतिक कार्यकर्ता सुनील कुमार और फाइन आर्ट्स अकादमी, काठमांडू, नेपाल के लोक कला संभाग में विभागाध्यक्ष रहे एस.सी. सुमन ने अपने विचार साझा किये। वेबिनार का संचालन दिल्ली के वरिष्ठ कलाकार एवं कला लेखक सुमन कुमार सिंह ने किया।

अपनी सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण और उसके प्रलेखन पर डॉ. शंभू कुमार सिंह ने कहा कि हमें गंभीरतापूर्वक नष्ट हो रही अपनी सांस्कृतिक विरासतों की दिशा में कार्य करना होगा क्योंकि हम पहले ही अपने अनेक लोकपरंपराओं को गंवा चुके हैं। उन्होंने इस बारे में वर्तमान समाज की उपेक्षाओं पर चिंता जतायी और कहा कि इस दिशा में समाज को पहल करने की आवश्यकता है।

एस.सी. सुमन ने कहा कि नेपाल में मृत्तिका उत्कीर्णन की परंपरा पूर्णिया और कोशी अंचल की तरह ही है और उसकी परंपरा को मूल स्वरूप में बनाये रखने की कोशिश की जा रही है और सरकार इस दिशा में गंभीर प्रयास कर रही है। इसके उलट संजय सिंह ने कहा कि पूर्णियां अंचल में इंदिरा आवास जैसी योजनाओं से मृत्तिका उत्कीर्णन की परंपरा को गहरा धक्का लगा क्योंकि यह मिट्टी की दीवारों पर बनाया जाता रहा है जबकि वहां पक्के आवास बनने लगे।

कला परंपराओं के प्रति आ रही उदासीनता के मद्देनजर सुनील कुमार ने कहा कि समय के साथ समाज में बदलाव अवश्यंभावी है लेकिन हमें यह विचार करना होगा कि उन बदलावों के बीच अपनी कला परंपराओं को किस प्रकार अक्षुण्ण रख पाएंगे। सुनील कुमार की बातों को ही विस्तार देते हुए सुमन सिंह ने कहा कि फोकार्टोपीडिया इसी दिशा में एक कोशिश है जहां एक स्थान पर बिहार की लोककला परंपराओं का विस्तृत डॉक्यूमेंटेशन उपलब्ध होगा और उसके डिजिटल आर्काइव का लाभ हमारी भावी पीढ़ी उठा सकेगी।—।

मिथिला चित्रकला: समाज एवं समस्याएं
PRESS RELEASE: 09072020

“मिथिला चित्रकला और हमारी लोककला परंपरा बदलाव के दौर से गुजर रही है। वह स्थानीय समाज से निकलकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गयी है, लेकिन हमारे ही लोकसमाज के बीच कलाकारों की स्थिति दयनीय है, उन्हें बहुत महत्व नहीं मिलता है”। मिथिला की ख्यातिलब्ध चित्रकार और नेशनल अवार्डी शांति देवी ने फोकार्टोपीडिया द्वारा आयोजित बेबिनार में ये बातें कहीं।

मिथिला चित्रकला: समाज एवं समस्याएं विषय पर आयोजित वेबिनार में शांति देवी के साथ बिहार की ख्यातिलब्ध साहित्यकार पद्मश्री उषाकिरण खान, दिल्ली की चर्चित लेखिका गीताश्री और कला समीक्षक सुनील कुमार ने अपने विचार साझा किये। इस मौके पर शांति देवी ने मिथिला के दलित कलाकारों के प्रति सरकारी उदासीनता और व्यावसायिक स्तर पर किये जा रहे भेदभाव पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि कुछ कलाकारों की बात छोड़ दें तो ज्यादातर दलित कलाकारों को कलाकार समझा ही नहीं जाता है।

पद्मश्री उषाकिरण खान ने मिथिला चित्रकला में नवीन अण्वेषण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि न केवल मधुबनी क्षेत्र में बल्कि कोशी अंचल समेत पूरे मिथिलांचल में भित्ति चित्रण की परंपराओं के रूपाकार अब लुप्तप्राय है और उन्हें संरक्षित करने के लिए जरूरी है। कलाकारों को उन्हें कागज पर उतारना चाहिए और शांति देवी को इस दिशा में नेतृत्व करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दलित समाज के भीतर यह परंपरा काफी गहरी रही है, लेकिन दुर्भाग्य से उनका कागज पर चित्रण कम हुआ है।

इसका कारण बताते हुए सुनील कुमार ने कहा कि मिथिला कलाकारों का एक बड़ा वर्ग आज भी आजीविका के संकट से जूझ रहा है और जब तक सरकार इस ओर ध्यान नहीं देती है, कलाओं के संरक्षण के प्रति आमतौर पर वह समाज उदासीन रहेगा। उन्होंने बिहार में लोककला को लेकर एक गंभीर शोध संस्थान की आवश्यकता पर भी बल दिया।

इस मौके पर शांति देवी ने सत्तर के दशक में मिथिला की दलित कलाकारों की सामाजिक स्थिति और अपनी कला यात्रा के बीच के संघर्षों पर विस्तार से बातचीत की। इस पर गीताश्री ने कहा कि कला के बीच व्याप्त यह संघर्ष ने केवल मार्मिक है बल्कि उसे दूर करने की दिशा में गंभीर प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शांति देवी जैसी कलाकार मिथिला समाज की धरोहर हैं और उनकी कला यात्रा और उनके संघर्षों से हमें बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।—।

मिथिला चित्र पटल पर कैसे उभरे रांटी और जितवारपुर
PRESS RELEASE: 02082020

मिथिला चित्रकला आज व्यवसाय का रूप ले चुका है। कला के लिहाज से यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है और हमें यह विचार करना पड़ेगा कि बाजारवाद की इस दौड़ में मिथिला चित्रकला कहां पहुंच रही है। ये सवाल उभरे “ मिथिला चित्रपटल पर जितवारपुर और रांटी गांव के उदय ” विषय पर शनिवार को आयोजित फोकार्टोपीडिया के वेबिनार में, जिसमें मिथिला चित्रकला की दो पद्मश्री कलाकार गोदावरी दत्त और बौआ देवी एक साथ उपस्थित थीं। इस बातचीत का संचालन दिल्ली के ख्यातिलब्ध कलाकार और कला लेखक रवींद्र दास ने किया था।

मधुबनी के दो गांव, जितवारपुर और रांटी मिथिला चित्रकला के लिए विश्वविख्यात हैं। मिथिला चित्रकला में उनके उदय पर प्रकाश डालते हुए पद्मश्री बौआ देवी ने कहा कि उन्होंने और पद्मश्री जगदंबा देवी, सीत देवी, जमुना देवी, उखा देवी ने समेत कई अन्य कलाकारों ने मिथिला चित्रकला में मौलिकता को महत्व दिया और सिर्फ कला के लिए जीया। परिणाम यह हुआ कि सत्तर की दशक तक सरकार की कोशिशों और चित्रकला के प्रति उनके समर्पण की वजह से मिथिला चित्रकला की ख्याति न केवल पूरे भारत में फैली, बल्कि विदेशों में भी फैली।

दूसरी तरफ रांटी के उदय पर पद्मश्री गोदावरी दत्त ने कहा कि 1970 के बाद जब वह गांव आयीं, तब गांव में कई परिवार चित्रकला कर रहे थे। उन्हीं दिनों मुंबई से भास्कर कुलकर्णी उनके घर आए। लेकिन, पर्देदारी की वजह से भास्कर कुलकर्णी से उनकी मुलाकात नहीं हुई। तब उन्होंने पद्मश्री महासुंदरी देवी के घर का रुख किया जिन्होंने कुलकर्णी जी के साथ काम करना स्वीकार लिया। इस तरह से मिथिला चित्रकला रांटी से बाहर आयी। इसमें मधुबनी में हैंडीक्राफ्ट बोर्ड के डायरेक्टर एचपी मिश्रा ने रांटी और जितवारपुर के कलाकारों की काफी मदद की थी। उन्होंने ने न केवल कलाकारों को खोज-खोज कर बाहर निकाला बल्कि उनकी कला को देश-विदेश तक पहुंचाने में मदद की।

गोदावरी दत्त ने कहा कि रांटी और जितवारपुर दोनों गांव 1962-63 के बाद चर्चा में आने लगे थे। इसमें तत्कालीन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्रा का योगदान था जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी थे। उनकी सलाह पर और इंदिरा गांधी की रुचि की वजह से पुपुल जयकर और भाष्कर कुलकर्णी का मधुबनी आना हुआ था।

बौआ देवी के मुताबिक सबसे पहले फ्रांस के रिसर्चर और कलाकार इव् वीक्वाड् जितवारपुर आये जिन्होंने गांव में कलाकारों को मौलिक काम करने के लिए प्रोत्साहित किया और उनके चित्र भी खरीदे। उसके बाद एरिका, रेमंड, हासेगावा, डेविड और इटली स्पेन, जापान और मॉरिसश से अन्य रिसर्चर मधुबनी आये। उन्होंने बताया कि जितवारपुर से सबसे पहले विदेश जाने वाली कलाकार पद्मश्री सीता देवी थीं जबकि रांटी से विदेश यात्रा करने वाली पहली कलाकार गोदावरी दत्त थी। गोदावरी दत्त ने कहा कि उन्होंने सबसे पहले देश के अलग-अलग हिस्से के चार कलाकारों के साथ भारत सरकार के कहने पर जर्मनी की यात्रा की और फिर अन्य कलाकारों के साथ मिथिला म्यूजियम के डायरेक्टर टोकियो हासेगावा के बुलावे पर मिथिला म्यूजियम गयीं। इससे न केवल मिथिला चित्रकला विदेशों में चर्चित हुई बल्कि जितवारपुर और रांटी का नाम भी रौशन हुआ।

बौआ देवी के मुताबिक उनके शुरुआती तीन चित्र डेढ़ रुपये में भाष्कर कुलकर्णी ने ही खरीदे थे। अगले वर्ष जब भाष्कर कुलकर्णी दुबारा जितवारपुर आये, तब उन्होंने तीन चित्रों के बदले पंद्रह रुपये दिये। यह बात गांवघर में तब चर्चा का विषय थी। गोदावरी दत्त की पहली पेटिंग एक अमेरिकी ने हैंडीक्राफ्ट बोर्ड के जरिए पच्चीस रुपये में खरीदी थी जब तब एक रिकॉर्ड मूल्य था।

यह पूछे जाने पर कि विदेशी रिसर्चर, और खरीदार आज भी जितवारपुर और रांटी का ही रूख क्यों करते हैं, गोदावरी दत्त ने कहा कि विदेशों से दिल्ली या मुबंई और वहां से सीधा मधुबनी आना आसान होता है। इस वजह से वे बहादुरपुर, बरहेता से लेकर समस्तीपुर तक के अनेक गांवों में नहीं जाते हैं जहां चित्र बनाए जाते हैं। इस विषय पर बौआ देवी ने कहा कि चूंकि मिथिला पेटिंग के ज्यादातर कलाकार इन्हीं दो गांव में रहते हैं, इसलिए वह स्वाभाविक रूप से आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

गोदावरी दत्त ने इस पूरी बातचीत में सबसे चौंकानेवाली बात यह कही कि जिस आर्चर की वजह से मितिथा पेटिंग मिथिलांचल की चहारदीवारी से बाहर निकली, उसके बार में उन्हें जानकारी नहीं थी और 1970 के दशक में शायद ही उनको कोई जानता था। — ।

Celebration of Folk Traditions : लोककलाएं, मुद्दे और कर्पूरी देवी
PRESS RELEASE: 28072020

मिथिला की मशहूर और मूर्धन्य कलाकार कर्पूरी देवी की आज प्रथम पुण्यतिथि है। कोरोना संकट और लॉकडाउन के बीच कलाकार, कला-समीक्षकों और कला लेखकों के एक छोटे से ग्रुप फोकार्टोपीडिया ने कर्पूरी जी के बहाने बिहार की लोककला-परंपराओं पर तीन दिन तक गंभीरता से बात-विचार करने की कोशिश की और उन्हें खासतौर पर आधुनिक और समकालीन कलाओं के बरक्स देखने की कोशिश की। यह कोशिश महत्वपूर्ण इस वजह से है कि हमें ऐसे आयोजनों की जरूरत है जिसमें अलग-अलग कला विधाओं के विद्वान, कार्यकर्ता, कलाकार और कला प्रशासक एक साथ एक मंच पर बैठें और अपनी कलाओं के वर्तमान पर विचार करें। तभी बहुत सारे मसलों का हल निकलेगा।

सेलिब्रेशन ऑफ फोक ट्रेडिशन “कर्पूरी चैप्टर” इसी तरह की एक कोशिश थी जिसमें एशियन ट्रेडिशनल टेक्सटाइल म्यूजियम, सियाम, कंबोडिया की संस्थापक और पूर्व निदेशक डॉ. चारू स्मिता गुप्ता, मिथिला म्यूजियम, जापान के संस्थापक टोकियो हासेगावा, उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान के निदेशक अशोक कुमार सिन्हा, भारत भवन, भोपाल से जुड़े रहे अखिलेश ईश और लखनऊ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स कॉलेज के पूर्व प्राचार्य जयकृष्ण अग्रवाल समेत अनेक गणमान्य वक्ताओं ने अपने विचार रखे। यह अपने तरीका का एक अनोखा प्रयास था क्योंकि बिहार की लोक कलाओं के परिदृश्य में यह संभवत: पहला आयोजन था जब देश के अलग-अलग कलाविधा से जुड़े महत्वपूर्ण कलागुरुओं ने हमारे एक मूर्धन्य कलाकार को याद किया। साथ ही जापान और अमेरिका तक के कलाकारों के वीडियोज को आयोजन का हिस्सा बनाया गया। यह एक कलाकार को कला माध्यमों से याद करने की सफल कोशिश थी जिसमें बिहार की लोक कलाओं और लोक कलाकारों की वर्तमान स्थिति पर गंभीरता से विचार किया गया।

कर्पूरी देवी बिहार की मूर्धन्य कलाकार थीं और अपने लालित्यपूर्ण कलाकृतियों के कारण वह जानी जाती रहीं। सुजनी कला से आजीवन उनका प्रेम रहा। दोनों पर उनकी पकड़ ऐसी थी कि उनका कोई जोड़ नहीं है। सबसे पहले उनकी चित्रकला की। कर्पूरी जी ने बोल्ड लाइन और चटक कलर के साथ-साथ परंपरागत ढंग से ही चित्रकारी की है। उन्होंने जो भी किया, गंभीरता से किया और उनमें एक परिपक्वता साफ दिखती है। आम जिंदगी के तत्वों को उन्होंने सुजनी कला के जरिए सफलतापूर्वक अभिव्यक्त किया।

कर्पूरी देवी एक बेहद संवेदनशील कलाकार थीं और कला के प्रति उनकी संवेदनशीलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अंतिम दिनों में भी वह कलाओं को अपने जीवन का प्राण-ऊर्जा मानती थीं। नब्बे-बानवे वर्ष की उम्र में भी पटना आना हो या कहीं भी जाना हो, कला के लिए या कला की कार्यशाला के लिए, वह कभी रूकती थीं। यह बहुत बड़ी बात है और शायद उनके दीर्घायु होने का कारण भी।

कर्पूरी देवी मिथिला कला की आत्मा थीं और सतत् सृजन उनके जीवन की पहली प्राथमिकता। उन्होंने ज्ञान के अपने अक्षुण्ण भंडार को हमेशा दूसरों में बांटा, उनके जीवन से यह बात हमारे लिए सीखने की है। — ।