लोकनायक राजा सलहेस का चरित्र-चित्रण

चूनाभट्टी, दरभंगा स्थित राजा सलहेस गहवर | राजा सलहेस पर 2016 में विस्तृत शोध के दौरान शोधार्थी सुनील कुमार द्वारा दर्ज एक चित्र
चूनाभट्टी, दरभंगा स्थित राजा सलहेस गहवर | राजा सलहेस पर 2016 में विस्तृत शोध के दौरान शोधार्थी सुनील कुमार द्वारा दर्ज एक चित्र

Character Sketch of Raja Salhesh
सुनील कुमार
कला शोधार्थी और लेखक

बिहार के सबसे लोकप्रिय लोकनायकों में से एक राजा सलहेस, मिथिलांचल और अलग-अलग इलाकों में प्राय: राजा सलहेस, लोकनायक सलहेस, सूरमा सलहेस या सलहेस भगत के नाम से संबोधित होते हैं। लेकिन, विगत दो दशकों में राजा सलहेस को लोक-देवता के रूप में स्थापित करने की प्रवृति बढ़ी है। इसकी शुरुआत ख्यातिलब्ध साहित्यकार ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म द्वारा 1973 में लिखे गये उपन्यास ‘राजा सलहेस’ से होती है, जिसमें मणिपद्म लोकनायक राजा सलहेस को देवीय गुणों और चमत्कारों से लोक-देवता के रूप में स्थापित करते हैं। दरभंगा के ख्यातिलब्ध नाटककार अविनाशचंद्र मिश्र कहते हैं कि मणिपद्म द्वारा राजा सलहेस में चमत्कारिक गुणों की स्थापना से पूर्व सलहेस राजा, सूरमा या भगत जैसी उपमा के साथ संबोधित किये जाते थे और राजा शब्द से उसका भाव स्पष्ट नहीं होता था। मसलन, एक राजा, राजपाट वाला राजा होता है और दूसरा मन का राजा, आमलोगों के हृदय का राजा।

मैथिली के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और लोक संस्कृति के शोधार्थी रहे महेंद्र मलंगिया इसे और अधिक स्पष्ट करते है। मलंगिया कहते हैं कि राजमुकुट वाला राजा सलहेस थे, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है और सलहेस किसी जाति विशेष के राजा हों, यह भी जरूरी नहीं है। लोकगाथा के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि सलहेस दलितों, गरीब-गुरबों, पीड़ितों, शोषितों, वंचितों के राजा थे। सलहेस जिन गुणों से संपन्न थे, उसमें उनका हृदय का राजा होना स्वाभाविक था। मिथिलांचल के कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि सलहेस हृदय के राजा तो थे ही, लेकिन छोटा ही सही, नेपाल के सिरहा जिले के महिसौथा में उनका अपना राजपाट भी था। बहरहाल, सलहेस में लोकनायक या राजा से देवता बनते हैं। क्यों और किन वजहों से, यह विवेचना का विषय है, लेकिन लोकगाथा में राजा सलहेस का चरित्र चित्रण किस प्रकार है, उसकी एक संक्षिप्त चर्चा यहां की गयी है।

राजा सलहेस का जन्म

राजा सलहेस के चरित्र-चित्रण से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि वर्तमान समय में प्रचलित लोकगाथा के मुताबिक सलहेस दिव्य पुरुष के रूप में अवतरित होते हैं। गाथा के मुताबिक नेपाल के महिसौथा में वाकमुनि नामक एक ऋषि बारह वर्षों से तपस्या कर रहे थे। उसी दौरान इंद्रलोक की अप्सरा मायावती (मंदोदरी नाम भी मिलता है) धरती पर आती है और वह वाकमुनी की तपस्या भंग कर देती है। वाकमुनी क्रोधित होकर मायावती को श्राप देते हैं कि अब वह मृत्युलोक या नरलोक में ही भटकना पड़ेगा। मायावती द्वारा काफी क्षमा याचना के बाद वाकमुनि कहते हैं कि मेरा श्राप निष्फल तो नहीं होगा, लेकिन इस भू-वन में तीन दिव्य पुत्रों और एक पुत्री की माता बनोगी। श्रृषि के आशीर्वाद से मायावती और सोमदेव के घर कमलदह तालाब में पुरइन के पात (पत्ते) पर तीन दिव्य गुण संपन्न पुत्रों और एक पुत्री अवतरित होते हैं। वाकमुनी से विमर्श के मुताबिक मायावती तीन पुत्रों के नाम क्रमश: सलहेस, मोतीराम और बुधेश्वर रखती है और अपनी पुत्री का नाम वनसप्ति। तीनों भाई किशोरावस्था से लेकर युवावस्था तक चमत्कारिक घटनाओं को अंजाम देते हैं और बनसप्ति अपने तपोबल से घनघोर जादूगरनी बनती है, तंत्र-साधिका बनती है।

व्यक्तित्व या चरित्र चित्रण – संक्षिप्त स्वरूप

लोकगाथा राजा सलहेस का मुख्य किरदार या नायक सलहेस का व्यक्तित्व अत्यंत विशाल है और उनके व्यक्तित्व की विशालता और विविधता कई बार आश्चर्यचकित भी करती है। इसमें अव्वल तो यही है कि दलित जाति का कोई नायक राजा है, जिस पर क्षत्रिय कुल का विशेषाधिकार है। वह राजा युद्ध कौशल और राजनीति में निपुण है। वह कल्याणकारी भी है और एकनिष्ठ पत्निव्रता है जिसकी अनेक प्रेमिकाएं हैं। इस लिहाज से उसका चतित्र अदभुत है।  

लोकगाथा के अध्ययन के पश्चात् मुख्य रूप से राजा सलहेस की चार विशेषताओं प्रत्यक्ष होती हैं:-

  1. वीर या योद्धा       
  2. चतुर राजनीतिज्ञ
  3. न्यायप्रिय और
  4. रसिक या प्रेमी
  1. योद्धा या वीर

सलहेस बचपन से वीर थे। किशोरावस्था तक आते-आते मल्ल युद्ध में उनकी प्रसिद्धि चहुंओर स्थापित हो जाती है। किंवदंती है कि 12 वर्ष की आयु तक आते—आते अपने पराक्रम से सलहेस महिसौथा में विशाल राज्य स्थापित कर लेते हैं। सलहेस जब युवा होते हैं तब कई युद्ध लड़ते हैं। बराटपुर के राजा बराट के साथ, सतखोलिया के राजा सैनी के साथ, श्यामलराज के साथ, तीसीपुर बंगाल के साथ, भुटानेश्वर के साथ और सभी युद्ध में विजयी रहते हैं। राजाओं, सामंतों, ग्राम-पतियों आदि से मल्लयुद्ध और युद्ध के जरिये सलहेस मिथिला क्षेत्र को विदेशी आक्रांताओं से मुक्ति दिलाते हैं और शांति कायम करते हैं।

2. चतुर राजनीतिज्ञ

सलहेस सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्षधर हैं और लोकगाथा के विविध प्रसंगों में उसका परिचय देते हैं। इसके लिए उनके द्वारा अपनायी गयी नीतियां, उनके चतुर राजनीतिज्ञ होने का परिचय देती है। मिथिलांचल को आक्रांताओं से बचाने के लिए राजनीतिक गठजोड़ करते हैं, खासतौर पर केवला किरात के साथ। केवला किरात के साथ मिलकर सलहेस भुटानेश्वर सुंग और मोकामागढ़ के राजा चूहड़मल को हराते हैं। केवला के साथ गठजोड़ इस आधार पर होता है भुटानेश्वर संग और केवला किरात के बीच शत्रुता है। शत्रु का शत्रु स्वभाविक दोस्त होता है। सलहेस राजा होते हुए भी पकड़ियागढ़ के राजा कुलेश्वर का पहरेदार बनना स्वीकार करते हैं, वह भी सलहेस की कूटनीति का हिस्सा माना जाता है ताकि चूहड़मल को परास्त कर गंगा गंडक और कोशी के क्षेत्र में विस्तारित मिथिला भूमि, उसके अन्न के भंडार और पशुधर की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। 

3. न्यायप्रिय

सलहेस न्यायप्रिय हैं, जिसमें वे कुल-सरोकारी और जनसरोकारी हैं। वह मोकामा के राजा चूहड़मल, तीसीपुर बंगाल या सतखोलिया के राजा शैनी, बनाटपुर के राजा बनाट आदि अनेक दमनकारी राजाओं के खिलाफ जंग लड़ते हैं और प्रजा को उनके अत्याचारों से मुक्ति दिलाते हैं। मत्स्य-नाय वाली व्यवस्था में सलहेस विवेकशील है और बुद्धिसंपन्न राजा की तरह व्यवहार करते हुए दिखाई पड़ते हैं। एक पक्ष यह भी है कि दुसाध जाति को चौर्य कर्म से जोड़ा गया है। सलहेस खुद तो चौर्य कर्म से अलग रखते हैं और तमाम पहलवानों को मल्ल-युद्ध या युद्ध में परास्त कर शांति और सुरक्षा स्थापित करते हैं। सलहेस आक्रांता नहीं हैं। वे युद्ध लड़ते हैं, लेकिन तब जब युद्ध लड़ना अनिवार्य हो जाता है।  

4. रसिक या प्रेमी

सलहेस बलिष्ठ है, पहलवान है, खूबसूरत देहयष्टि के मालिक है, कर्मठ हैं, वीर है, सुदर्शन हैं। ऐसे में अनेक राजकन्याओं का उनकी तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक है। बनाटपुर के राजा की बेटी सामर या माजरि, जो सलहेस की ब्याहता बनीं, पकड़िया के राजा कुलेश्वर की बेटी, चंद्रावती, तरेंगना या मोरंग के राजा महेश्वर भंडारी (कहीं-कहीं हलेश्वर) की चारों बेटियां – रेशमा, कुशुमा, दौना, मालिन और भी कई राजकुमारियों के हृदय पर सलहेस राज करते हैं और यह अनुराग कितना प्रखर है कि सलहेस के बार-बार उनका प्रेम ठुकराने के बावजूद  सलहेस के प्रति उनका प्रेम नहीं घटता है। सलहेस सामाजिक जीवन में नारी के प्रति सम्मान के सर्वोच्च भाव का प्रकटीकरण करते हैं। यही वजह है कि वह सती सामर या माजरि के प्रति एकनिष्ठ बने रहते हैं।   

दरभंगा के विद्वान अविनाश चंद्र मिश्र लिखते हैं कि सलहेस शिव भक्त हैं। उनके चरित्र में बुद्ध की करुणा भी है। इस लिहाज से यह लोकगाथा शैव और बौद्ध धर्म की भावना के बीच  सामंजस्य की भी गाथा है। एक अंतिम बात, सलहेस प्रकृति-प्रेमी हैं। उनके पास अपनी सुंदर फुलवारी है। लेकिन, दुर्गा के कहने पर और अधिक सुंदर फुलवारी देखने की लालसा में सलहेस पकड़ियागढ़ की फुलवारी जाते हैं, जहां चंद्रा या चंद्रावती से उनकी पहली मुलाकात होती है। सलहेस को कमलदह बहुत पसंद है क्योंकि वहां कमल के फूल हैं और वहीं से फूल लेकर वह शिवमंदिर और कमला मंदिर में पूजा किया करते थे।

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लोकगाथा राजा सलहेस की सामाजिक प्रसंगिकता
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